16/06/2017

तुम्हारे चेहरे पर


                            रूपों का विस्तार तुम्हारे चेहरे पर
                            दिखता माँ सा प्यार तुम्हारे चेहरे पर
                            कैसे खुद को रोक सकूँ ,मेरी दुनिया
                            लुट जाए सौ बार तुम्हारे चेहरे पर

                            छोटी बिंदिया माथे पर ऐसे सोहे
                            हों सोलह श्रृंगार तुम्हारे चेहरे पर

                           जब से होंठों ने होंठों को पाया है
                           तब से है त्यौहार तुम्हारे चेहरे पर

                           वर्णन करने में ये छह की छह ऋतुएँ
                           कम पड़ती सरकार तुम्हारे चेहरे पर

                           कान्हा बनकर घूँमूँ तेरी यादों में
                           दिखी राधिका चार तुम्हारे चेहरे पर

                           तेरी गोदी में माँ के आँचल का सुख
                           दिखता प्रेम अपार तुम्हारे चेहरे पर

                           जी करता है जन्मदिवस के अवसर पर
                           लिख दूँ सारा प्यार तुम्हारे चेहरे पर ।।


अपने जन्मदिन (19 जून) के अवसर पर तुम्हारे लिए
एक छोटी सी रचना इस उद्देश्य से कि मेरी
काल्पनिक दुनिया में हमेशा तुम इसी
तरह अपनी यादों के साथ मुझे सजाती रहना
इससे भी गम्भीर विचार देना,अपनी यादों से
लबरेज़ रखना कि हमेशा तरोताज़ा रहूँ मैं
तुम्हारी यादें ही तो हैं जो मुझे ताकत देती हैं
किसी भी कार्य को बेहद सलीके से करने में
तुम्हारा प्यार आकाश की तरह है जो मुझे
ढक रखा है ,तुम्हारी यादें सागर की लहरों की तरह हैं
जो मेरे हृदय को और झकझोरती हैं तरड़्गित करती हैं ।।

30/04/2017

बना सकती हो क्या

मुझको अपना मेहमान बना सकती हो क्या ?
मुझसे थोड़ी पहचान बना सकती हो क्या ?

जिसको भगवान बनाओ उसको पूजो पर
मुझको भोला इन्सान बना सकती हो क्या ?

मैं मन्दिर ,मस्जिद गिरिजाघर को क्यों जाऊँ
खुद को मेरा भगवान बना सकती हो क्या ?

मैं गिनता हूँ उन्मुक्त गगन में तारों को
खुद को तुम मेरा चाँद बना सकती हो क्या ?

छोड़ो सारा संसार गजब की दुनिया है
होंठों से छूकर जान बना सकती हो क्या ?

यूँ मत खोजो दुनिया में अंधे लोगों को
मुझको देखो पति-प्राण बना सकती हो क्या ?

26/04/2017

बहुत हैं

अल्लाह तेरी नज़र में बेशुमार बहुत हैं
ईश्वर नही दिखे कहीं दरबार बहुत हैं ।
इक मैं ही नही प्यार करके पाप किया हूँ ,
धरती पे मेरे जैसे गुनाहगार बहुत हैं

नज़रें जमाए देखती है हुश्न - मुहब्बत
मुझ जैसे उस नज़र में गिरफ्तार बहुत हैं

इस देश की हमदर्द निगाहों से मदद लो
सब नीच ही नही हैं मददगार बहुत हैं

गाँवों की दशा देख शहर ही भला लगे
घर कम ही देखता हूँ मैं दीवार बहुत हैं

माँ की दुवाएँ साथ हैं, बहनों की इबादत
गुस्से भरे पिता हैं मगर प्यार बहुत है

दाढ़ी,जटाएँ देख के भरम में मत पड़ो
पाखण्डियों के नाम बलात्कार बहुत हैं

बहनों की , बेटियों की यूँ इज्जत से न खेलो
शहरों में हवस के लिए बाज़ार बहुत हैं

गैरों का खाके कब तलक आराम करोगे
बाँटो तो सही ,देश में हकदार बहुत हैं

इसका कभी उसका हूँ सदा रोल निभाया
चेहरा है एक दोस्तों किरदार बहुत हैं

दिल से मिला हूँ सबसे नही बुद्धि लगाई
वो सोंचते हैं खुद को समझदार बहुत हैं

हर पाँच - वर्ष बाद दिखें हाँथ जोड़कर
भारत में दिखी नक्कटी सरकार बहुत हैं

दूजे के काँध रख के मियाँ ट्रिगर दबाएँ
इक " नील " तू ही मूर्ख होशियार बहुत हैं ।।

16/04/2017

न जाने कल कहाँ ये दोस्त तेरी दीक्षा हो

प्रिय बचपन की दोस्त दीक्षा मिश्रा जी के लिए उनके विशेष
आग्रह पर उनको समर्पित  -------

महकती हो सदा फूलों सी वो ऐसी फिज़ा हो
खुले हों जुल्फ लहराती हुई कोई निशाँ हो ,
चमकती,चमचमाती धूप हो जैसे शरद की
सुनहरी शान्त सी कोमल हमारी दीक्षा हो ।।

नही चन्दा ,नही सूरज ,नही गुलनार माँगू
सदा खुशियों भरी, पावन पवन वो,दीक्षा हो ।।

अधूरी एक भी किरणें नही टकराएँ उससे,
कि छनकर जाएँ जिसपे रोशनी वो दीक्षा हो ।।

सभी हों राह ऐसी आज जिसपे पैर तेरा
पड़ें ,बिछ जाएँ सारे फूल जिसपे दीक्षा हो ।।

मिटें नापाक वो सारी सभी की भावनाएँ
कि जिसकी सोंच पे बैठी हुई ये दीक्षा हो ।।

बड़ी हसरत,बड़ी चाहत,बड़ा महफूज़ हूँ मैं
जिसे महफूज़ तुम रखना हमारी दीक्षा हो ।।

बहुत शीतल हिलोरें मारती हैं भावनाएँ
कि हो गरमी में जो बदरी सदृश वो,दीक्षा हो ।।

चलो अब नील तुम भी साथ चल लो ,
न जाने कल कहाँ ये दोस्त तेरी दीक्षा हो ।।

14/04/2017

कोशिश करता हूँ

लिखने और मिटाने की मैं कोशिश करता हूँ ,
अक्सर तुझको पाने की मैं कोशिश करता हूँ

सूरज,चन्दा,फूल,खिलौने डालूँ तेरी झोली में
तुझमें खुद मैं घुल जाने की कोशिश करता हूँ

माँ के चरणों की गाथाएँ बाबू जी का प्यार
सुबह-सवेरे दोहराने की कोशिश करता हूँ

बहनें हों उन्मुक्त हमारी जितना चाहें पढ़ पाएँ,
बाबू जी को समझाने की कोशिश करता हूँ

चाचा चाची,मामा मामी,भाई भौजी सब
सारे रिस्तों को पाने की कोशिश करता हूँ

शहरों में वो बात कहाँ जो गाँवों की अमराई में
फिर अपने घर को जाने की कोशिश करता हूँ

जन्नत - स्वर्ग की बातें अद्भुत कौन देख पाया अब तक
इक दूजे को सुलझाने की कोशिश करता हूँ

जिनसे आँखें डरती आई जीवन के हर मंज़र पे ,
उनसे आँख मिलाने की मैं कोशिश करता हूँ ।।

जब - जब अपना रूप बिगाड़ी तानाशाही सरकारें,
तब - तब मैं खुद टकराने की कोशिश करता हूँ ।।

30/03/2017

हाशिए पर गंगा

माँ,
मैं देख रहा हूँ
तुम्हारी पीड़ा,तुम्हारे कष्ट

मैं देख रहा हूँ ,
कि कैसे तुम्हारे हृदय पे करती हैं चोट ,
मथ देती हैं तुम्हारे पेट को
झकझोर देती हैं पूरी की पूरी शरीर
ये आधुनिक नावें,
काला कर चुकी हैं समूचे जल को अपने धुआँ से ।

मैं देख रहा हूँ ,
कि कैसे तुम्हारे नाम पे खेली जा रही है
ओछी - राजनीति ,
खर्च किए जा रहे हैं हजारों करोड़ रूपये
पवित्रता ,स्वच्छता और निर्मल बनाने का नाम दे - देकर ।

क्या किसी ने कभी अपनी माँ से राजनीति खेली है क्या ?

मैं देख रहा हूँ कि लगातार
तुम धंसती जा रही हो राजनीतिक - दलदल में
जहाँ लोग तुम्हारा सहारा नही बन रहे हैं
अपितु दिखा रहे हैं तुम्हें हाँथ
औपचारिकता पूरी करने के लिए
तुम्हारे नाम पर गद्दी पे बने रहने के लिए ।

माँ,
मैं देख रहा हूँ ,
कि कैसे दोहन हो रहा है तुम्हारा
इस ग्लोब्लाइजेशन के दौर में ।
लगातार तुम्हारी कोख में फेंका जा रहा है
कचरा ,तैर रहा है मैला
और तो और मुर्दे भी तैरते दिख जाते हैं कभी - कभी ।

शहर के कल - कारखाने ,फैक्ट्रियाँ
और असंख्य गंदी नालियाँ तुमसे आके मिलती हैं
प्रदूषित करती हैं तुम्हें ,
और तुम बड़ी ही सहजता से स्वीकारती हो उन्हें,
सहती हो ।

टूट गई हैं तुम्हारी लहरें
समाप्त होता जा रहा है तुम्हारा जल
अब मैं तुम्हें बूढ़ी कहूँ या बीमार
कुछ सूझता नही है ।

अब तुम ही कहो
मैं तुम्हारा चारण बनूँ ,
गाऊँ तुम्हारे पवित्रता की झूठी स्तुतियाँ
या स्वच्छता का कोरा लिबास पहनाऊँ तुम्हें
या कह दूँ मैं सही - सही सारी बातें ।

मैं क्या करूँ माँ ,मैं क्या करूँ
असमंजस में हूँ ,
सही कहूँगा तो तुम्हारे भक्तों को ठेस पहुँचेगी
और गुण गाऊँ तो तुम्हारे साथ धोखा होगा
क्या करूँ माँ ,मैं क्या करूँ ।।

08/03/2017

विवाह (एक दृश्य)

आस्था का देव से अब हो रहा संगम यहाँ ।
सात फेरों से सजा है प्यार का बंधन यहाँ ।।

माह बाकी है अभी से हो रही तैयारियाँ,
सज रहें हैं घर सुहावन सज रही हैं क्यारियाँ
मित्र ,बन्धु संग साथी फोनकर - कर कह रहे
छोड़ दूँगा इस महोत्सव में भरी पिचकारियाँ
फिर तुम्हें उन सात रंगों में रंगूँगा इस कदर
भूल जाओगी सभी दुःख,और आओगी निखर

प्रेम की बातें मगर यह दे रही उलझन यहाँ ।।

बीतती है रात जग - जग ,बीतते हैं दिन सभी
अब नही कहता कोई कुछ काम कर लो तुम कभी
मिल रहा है स्नेह सबसे ,मिल रहा है प्यार भी
हो रहा है आजकल मेरा बहुत सत्कार भी
मैं अचम्भित हो रही हूँ बदलते व्यवहार से
ये बहन भी दूर होती जा रही इस यार से

देवतासम मानते सब कर रहे वन्दन यहाँ ।।

कर रही चहुँओर से अटखेलियाँ भाभी सभी
जा नही सकती अकेली ,रोंकते हैं सब अभी
चहलकदमी हो रही फिर वो अकेली कौन है
भर गया घर - द्वार रिस्तेदार से फिर मौन है
और मेरे गाँव की परिहास करती हैं सखी
बँध गयी ना हे प्रिये !जो खूब तुम बहती रही

लग रही हल्दी तुम्हें ,अब लग रहा चन्दन यहाँ ।।

यूँ अकेली बैठकर है देखती निज रूप को
और दर्पण में खिलाई सर्दियों में धूप को
हाँथ मेंहदी से सजे हैं ,हैं महावर पैर में
खो गई है स्वप्न - सुन्दर से सुहाने सैर में
फिर झिझकती है युँ ही जैसे कि दरवाजा खुला
दी चलो नीचे रही हैं माँ तुम्हें कब से बुला

सज रही है ,संवरती है ,लग रहा उबटन यहाँ ।।

और अब समधी सहित बारात आई द्वार पर
फट रहे गोले चमत्कृत हो रहा आकाश - घर
देखती सखियाँ सभी हैं इस परम - त्यौहार को
देखती हैं संग ही अपने सखी के प्यार को
गूँजता वातावरण है दिव्य मंत्रोच्चार से
हैं पधारे आज चतुरानन मेरे उद्गार से

आज दूल्हा खुश हुआ ,मुस्का रही दुल्हन यहाँ ।।

एक दूजे के गले में डालने माला लगे
तालियों की गड़गड़ाहट पुष्प बरसाने लगे
और अब विवाह की वह पुण्य वेला आ गई
हो गया विवाह ,अब वादे निभाने है चली
कर चुकी अर्पण ,समर्पण भाव - मन सब रीतियाँ
मिल रही है प्रेम से उद्गार करती प्रीतियाँ

काल - वेला बढ़ रही ज्यों बढ़ रही धड़कन यहाँ ।।

चँहचहाती ,कूकती थी जो कभी आँगन तले
सोचती है ,पोछती आँसू लिपटती है गले
माँ,बहन,भाई,पिता सब रो रहे हैं इस कदर
नयन से आँसू नही ,गिरता समुन्दर फूट कर
साथ है अब छूटता आई विदाई की घड़ी
रो रहे हैं वृक्ष - वन सब, यह प्रकृति भी रो पड़ी

नील (आज) करते देवगण भी अतिथि अभिनन्दन यहाँ ।।

आस्था का देव से अब हो रहा संगम यहाँ ।
सात फेरों से सजा है प्यार का बन्धन यहाँ ।।


यह कविता मैं अपने दो दोस्तों को समर्पित करता हूँ -------
दीक्षा मिश्रा (बचपन की दोस्त) और पूजा त्रिपाठी ( बुआ जी )
 मेरी तरफ से आप दोनों को आपके विवाहोत्सव की ढ़ेर सारी
शुभकामनाएँ,बधाइयाँ ।।

तुम्हारे चेहरे पर

                            रूपों का विस्तार तुम्हारे चेहरे पर                             दिखता माँ सा प्यार तुम्हारे चेहरे पर      ...