22/07/2016

" काशी ''

 काशी की महिमा क्या गाऊँ घर - घर यहाँ शिवाला है ।
 जितने उनके भक्त यहाँ हैं सबके संग मतवाला है ।।

नील करे है नमन आपको नीलकंठ स्वीकारो अब,
चरणपादुका में सर रखा हूँ नटराज पधारो अब,
जीवन को जो धन्य बना दे ऐसा भोला - भाला है ।।

 न लेते हैं दही, मलाई न लेते सोना चाँदी,
 न श्रृंगार करें वो अपना न वो उसके शौकी,
 मात्र लेश भर भस्म लगा दो बस प्रसाद भंग प्याला है ।।

 एक तरफ माँ अन्नपूर्णा दुखियों के दुःख दूर करें,
 अहंकार जिसमें भर जाए महादेव फिर चूर करें,
 ऐसा मञ्जुल - दृश्य सुनहरा मेघ जहाँ पर काला है ।।

 कालहरण हैं भैरव बाबा सदा यहाँ विश्राम करें,
 संकट मोचन हनूमान जी राम - भजन मे शाम करें,
 काशी की धरती पे प्यारा संगम बड़ा निराला है ।।

 पापहारिणी गंगा - माँ सब पाप हरण कर लेती हैं,
 शुभ्र - वर्ण की सरस्वती संताप हरण कर लेती हैं,
 शमी -  पत्र हैं अर्पित करते हाँथ मंदार की माला है ।।

 पाँच - पाँच विश्वविद्यालय हैं, राजधानी है शिक्षा की,
 साधु - संत का गढ़ है काशी, उचित व्यवस्था दीक्षा की,
 कई देश के लोग यहाँ, पर भेद न गोरा - काला है ।।

  इसी बनारस सारनाथ से राष्ट्रचिह्न हैं ग्रहण किये,
  इसी बनारस कालनगर में जाने कितने शरण लिये,
  पंचक्रोशी की यात्रा करके  कितनों ने दुःख टाला है ।।

 काशी मोक्षदायिनी नगरी लोग यहाँ मरने आते,
 मणिकर्णिका, हरिश्चन्द्र पर इच्छावश जलने आते,
 मोक्ष प्राप्त कर जाते हैं वो साथ में डमरू वाला है ।।

 सुबह भोर में उठकर सारे संत - महात्मा ध्यान करें,
 महादेव से सुबह यहाँ पे महादेव से शाम करें,
 महादेव पे वारि जाऊँ ऐसा क्या रंग डाला है ।।

 काशी की महिमा क्या गाऊँ घर - घर यहाँ शिवाला है ।
 जितने उनके भक्त यहाँ हैं सबके संग मतवाला है ।।

1 " छाया है गहरा अन्धकार "

छाया है गहरा अन्धकार,
ऐसे में कुछ कर लो विचार ।।

संसार - समर सा लगता है
दुर्बल - जनमानस दिखता है
भाई , भाई को काट रहा,
बेटा  माँ - बाप को डाँट रहा
अब प्रेम का मौलिक - रूप नही
खिलने वाली वह धूप नही
अंगार पे चलते लोग यहाँ
पत्थर से लड़ते लोग यहाँ
हम उनसे क्या टकरायेंगे
क्या उनको मार भगायेंगे
जब घर वाले ही खन्जर हैं
आवारे हैं, सब बन्जर हैं
वो आ समक्ष ललकार रहा
प्रतिक्षण करता वो वार रहा
हम पीछे भगते जाते हैं
बस पीठ पे गोली खाते हैं
ऐसे समयों में दूर रहो
यूँ कहो न ,मुझसे करो प्यार ।।
                           
 ईराक हो या अफगान यहाँ,
सीरिया हो या जापान यहाँ
यूरोप में गोले बरसे हैं
खाने - पीने को तरसे हैं
अब खून से सड़कें लाल हुई
लोगों के जान की काल हुई
माँ पुत्र का चिथड़ा तन लेकर
परिजन का वो क्रन्दन लेकर
जाने कैसे सोई होगी
जाने कैसे रोई होगी
आँखों से आँसू सूख गये
जो पास कभी थे दूर गये
अब कैसे वह जी पायेगी
निश्चित पागल हो जाएगी
दुनिया को कुछ भी लगे मगर
मुझको ये बात रुलाती है
ऐसी स्थिति को तुम भी समझो ।
पश्चात करो बातें हजार ।।

नीरवता मुझको दिखती है
विह्वलता तम पर लिखती है
मार्तण्ड अदृष्ट सा लगता है
अब वह प्रचण्ड सा दिखता है
घनघोर निराशा सी छाई
यह देख मृत्यु - आँधी आई
सब नष्ट - भ्रष्ट हो जायेगा
यदि उसको मीत बनायेगा
यह देख सामने काल खड़ा
है लिए रूप विकराल बड़ा
मुख का आकार नही इसके
तन का विस्तार नही इसके
पर हैं विचार निकृष्ट बहुत
वह मारेगा , है धृष्ट बहुत
किस तरह उसे समझाऊँ मैं
किस मार्ग से उस तक जाऊँ मैं
इस निर्मम - विकट परिस्थिति में ।
प्यारी ! बातें न करो चार ।।

 वह धीरे - धीरे बढ़ता है
निज - लक्ष्य को सुदृढ़ करता है
ऐसी प्रचण्ड सी खाई है
अब पास नही परछाई है
पर डरो नही सत्कारो तुम
अपने विचार से मारो तुम
वह मूर्ख नही यह ज्ञान करो
बातें करने में ध्यान धरो
वरना, वह खूब रुलायेगा
तन काट - काट तड़पायेगा
कलुषित विचार वो रखता है
ईश्वर से भी न डरता है
आगन्तुक है बिभीषिका कल
उसको तू सोंच समझ कर चल
प्रज्ञा - प्रयोग में लाओ अब
उसको भी गले लगाओ अब
हे प्रियतम ! ऐसे जीवन में ।
तुम समझो कुछ मेरे विचार ।।

 पर सोंच समझ के कार्य करो,
पहले देखो फिर वार करो
वरना प्यारे! फँस जाओगे
जा दलदल में धँस जाओगे
अब उठो शेर! रणभेरी है
तेरे आने की देरी है
और हाँथ में इक शमशीर रखो
तुम युद्ध करो और वीर बनो
मारो उसको, काटो उसको
सौ टुकड़े कर बाँटो उसको
मैं फरसा लेके आता हूँ
उसका सर पैर में लाता हूँ
मैं आवारा कहलाऊँगा
मैं हत्यारा कहलाऊँगा
इसका मुझको दु:ख दर्द नही
भारतीय हूँ मैं, नामर्द नही
मैं बोल चुका जो कहना था ।
प्रियवर क्या हैं तेरे विचार? ।।

 छाया है गहरा अन्धकार ।
ऐसे में कुछ कर लो विचार ।।


" गीत गाता हूँ मैं "

गीत गाता हूँ मैं,
                   गुनगुनाता हूँ मैं ।
एक तुमको हृदय में,
                    बसाता हूँ मैं ।।
तन ये अर्पित किया,
                मन समर्पित किया ।
आत्मा की धरातल पे,
                         पाता हूँ मैं ।।
जीत लो ये जमीं,
                     जीत लो आसमाँ ।
पास आओ कि तुमको,
                          रिझाता हूँ मैं ।।
तुम हृदयस्पर्शिनी,
                         मेरी प्रियदर्शिनी ।
बातें तुमको ही सारी,
                           बताता हूँ मैं ।।
मेरी जीवनलहर,
                        मेरी आह्लादिनी ।
अपनी कविताएँ तुमपे,
                          बनाता हूँ मैं ।।
मुझको कुछ भी कहो,
                           अब सजा चाहे दो ।
हृदय की गति को अपने,
                                   सुनाता हूँ मैं ।।

" वो हमें हम उन्हें भूल जाने लगे "

वो हमें हम उन्हें भूल जाने लगे ।
पास आए मगर दूर जाने लगे ।।

गुल में जो साज थे सारे झड़ने लगे,
शूल आके हृदय में जो गड़ने लगे ।
वक्त की आँधियों ने बदल सब दिया,
आज वो ही हमें आजमाने लगे ।।

एक अर्शे से चाहत थी जिस बात की,
बात हो कुछ हमारे मुलाकात की ।
तोड़ डाले सभी भाव - बन्धन के वो,
जिनको पाने में शायद जमाने लगे ।।

अभ्र से सब्र जब टूट जाते हैं तो,
वादियों से घटा छूट जाती हैं तो ।
इश्क जब प्यार से रूठ जाता है तो,
हम उन्हें प्यार से तब मनाने लगे ।।

लफ्ज मुख से निकलते नही वक्त उस,
वो मुझे देखकर रोज होते हैं खुश ।
पर परेशाँ तो होते हैं वो भी कभी,
मुझसे नजदीकियाँ वो बढ़ाने लगे ।।

मैं भी था प्यार पे अपने बिलकुल अड़ा,
भाव के बन्धनों को रहा था बढ़ा ।
वक्त की साजिशों से पलट सब लिया,
अब मुझे प्यार से वो बुलाने लगे ।।

फिर चली सर्द - वायु  उसी रात को,
उसने खोली हमारी गई बात को ।
मुझको याद कराया मेरा पहला दिन,
पुनः आपस में प्यार जताने लगे ।।

जो भी थी दूरियाँ सारी मिट अब गई,
जो गलत - फहमियाँ थी सिमट सी गई ।
एक - दूजे लिपट कर गले हम मिले,
वो हमें, हम उन्हें पास पाने लगे ।।

वो मेरी भावनाओं को सुनती गई,
साथ ही ख्वाबों को अपने बुनती गई ।
आसमाँ के तले नील लेटे हुए,
एक - दूजे के सपने सजाने लगे ।।

वो हमें हम उन्हें भूल जाने लगे ।
पास आए मगर दूर जाने लगे ।।

" वसन्त और तुम "

यह कुसुम पवन सब बार - बार,
उन चरणों को छू जायें हैं ।
नव रस का जो मिथ्याभिमान,
नतमस्तक सम (सामने ) हो जाए है ।।

जब चलती हैं वो नदियों में,
नदियाँ भी हिलोरे खाएँ हैं ।
जब उतरें वो सागर में तो,
वह चरण चूमने आये है ।।

वन, उपवन की क्या बात कहें,
जो स्वयं ही आश लगाए हैं ।
वह कोमल - कोमल तृण जो हैं,
न छूने से मुरझाए हैं ।।

मुखड़ा उनका इतना सुन्दर,
कि चाँद भी शीश झुकाए है ।
जल, थल, नभ सब गर्व करते,
मुखड़े का दर्शन पाये हैं ।।

हैं कोमल, मधुर अधर उनके,
मधुशाला सी ढरकाए हैं ।
जब निकले हैं बाहर को वो,
स्वागत में बारिश आए है ।।

मीठी इतनी वाणी उनकी,
कि कोयल भी ललचाए है ।
उस वाणी के श्रवणातुर जन,
अरसिक रसिक हो जाए हैं ।।

हैं कपोल कोमल उनके,
मानो की कमल समाये हैं ।
हैं आज हमारे सामने वो,
गालों पे लालिमा लाए हैं ।।

है मधुशाला उन नयनों में,
जिनको देखे ललचाए हैं ।
हैं मृगनयनी उनकी आँखें,
उनमें ही प्राण समाएह हैं ।।

बालों की क्या बातें करना,
जो रातरानि महकाए हैं ।
छूने में हाँथ गर्व करता ,
सूँघने पे वो इठलाये हैं ।।

है सुमेरु - स्तन उनका,
हम देख - देख हर्षाए हैं ।
हैं शर्मीली इतनी वो कि,
कुच पे वे हाँथ लगाये हैं ।।

है शर्म, हया इतनी उनमें,
कि बातों से डर जाए हैं ।
है छुई - मुई उनकी आदत,
छूने पर वो शर्माए हैं ।।

21/07/2016

" इक्कीसवीं सदी और हम "

इक्कीसवीं सदी है और इतनी बन्दगी है,
खामोश है जमाना खामोश जिन्दगी है ।
सूखी हुई हैं आँखें न पेट मे निवाला,
अभियान चल रहे हैं और इतनी गन्दगी है ।।

कुछ लोग दूसरों के बढ़ने से जल रहे हैं,
कुछ लोग मुकद्दर को अपने बदल रहे हैं ।
रोते वही हैं प्रायः जो शान्त हो गये हैं,
जो रेस में लड़ते हैं वो ही सँभल रहे हैं ।।

विद्वान यहाँ बैठे सब मूर्ख भर गये हैं,
जो पढ़ना चाहते थे वो छात्र मर गये हैं ।
पढ़ना - पढ़ाना है नही, भौकाल बनाना है,
जिनके है पास पैसा बस वो सँवर गये हैं ।।

जीवन बड़ा अजीब मुसाफिर सा घूमता है ,
पागल हुआ प्रसन्न सदा मस्त झूमता है ।
न द्वेष भाव उसमें, न राग की है आशा,
जो जैसे चाहता है वो वैसे लूटता है ।।

कितनी सड़क पुरानी टूटी हुई पड़ी हैं,
जो नई बन रहीं हैं फूटी सी लग रही हैं ।
जिनपे थी जिम्मेदारी, पैसे ही खा गये वो,
हर बात अब बड़ों (नेताओं) की झूठी सी लग रही हैं ।।

हैं कई ऐसे लोग जिनके सर नही है छत,
कितने तो एक्सीडेन्ट में होते हैं छत - विछत ।
डूबी है जवानी नशे में उनको क्या खबर,
कितने गरीब सोते हैं सड़कों पे सदा मस्त ।।

" एक तरफ मेरी माँ है और एक तरफ है प्यार मेरा "

एक तरफ मेरी माँ है और एक तरफ है प्यार मेरा ।
दोनों मेरा जीवन हैं दोनों में ही संसार मेरा ।।

अवगाहन करता हूँ अपनी माँ से सुनी कहानी में,
उसको मैं प्रायः देखूँ राधा जैसी दीवानी में,
एक कहानी अकथनीय है दूजे से विस्तार मेरा ।।

पिता, भाइयों, बहनों में भी प्यार अजेय सा दिखता है,
निश्छल और निष्कपट प्यार न बाजारों में बिकता है,
गुरुजन मेरे ईश्वर हैं उनसे ही सारा सार मेरा ।।

जीवन भी मुश्किल घड़ियों में कठिन परीक्षा लेता है,
भौतिकता जो सीख लिया इच्छा पूरी कर लेता है,
द्वार और घर छोटा है पर प्यार भरा परिवार मेरा ।।

स्वार्थ और नि:स्वार्थ भाव के लोग बहुत से दिखते हैं,
लोग यहाँ ऐसे भी हैं जो कुछ पैसों में बिकते हैं,
मित्र बहुत उत्तम हैं मेरे जीवन है साकार मेरा ।।

बहन नही कहता मैं सबको और नही कहना चाहूँ,
पर इज्जत करता हूँ सबकी सबके संग रहना चाहूँ,
किसी के भावों से मैं खेलूँ ऐसा न व्यवहार मेरा ।।

देशप्रेम करना चाहें और देशप्रेम हम करते हैं,
मातृभूमि पे नतमस्तक हैं, मातृभूमि पे मरते हैं,
प्यार हमें करना आता न देशद्रोह व्यापार मेरा ।।

कितने राष्ट्रभक्त फौजी दंगों में मारे जाते हैं,
कितने सैनिक बेचारों के संघ जलाये जाते हैं,
चाहूँ मैं ऐसे भक्तों को नमन करें स्वीकार मेरा ।।

गंगा की अविरल धाराएँ काशी में जो बहती हैं,
कल - कल, छल - छल करती मेरे कानों मे कुछ कहती हैं,
उठो पुत्र ! ले जाओ जीवन का सर्वस्व श्रृंगार मेरा ।।

बहुत क्लिष्ट शब्दों से अपनी कविताएँ वो लिखते हैं,
जनमानस के बीच नही विद्वानों में वो दिखते हैं,
 भावों की कविता लिखता, न शब्दों का बाजार मेरा ।।

अभी आपका अनुज हूँ मैं और अभी अनुज ही रहने दो ,
प्यार से मैं जीवन जीता हूँ ,प्यारी बातें कहने दो,
अभी मञ्च पे आया हूँ यूँ करो न जय जयकार मेरा ।।

एक तरफ मेरी माँ है और एक तरफ है प्यार मेरा ।
दोनों मेरा जीवन हैं दोनों में ही संसार मेरा ।।


" मैं हिन्दुस्तान दिखाउँगा "

एक लफ्ज में बयाँ कर दिये
अपना सारा ज्ञान हैं ,
न तुम, न मैं, न ये दौलत
दो दिन के मेहमान हैं ।
अपनी छाती चौड़ी कर लो
डट जाओ अब सीमा पे ,
अमर शहीद भगत सिंह जैसे
कितने ही कुर्बान हैं ।।

देश हमारा टिका हुआ है
वीर सपूत के कन्धों पर ,
 होगा अत्याचार बराबर
लोफड़ और लफड़्गों पर ।
न होगी उनकी सुनवाई
सजा यहाँ की मौत है,
बम फोड़े गोला बरसायें
आतड़्की उन दड़्गो पर ।।

क्या कसाब , क्या अफजल ऐसे
कितने मारे जायेंगे ,
दाउद भी यदि बुरी दृष्टि से
देखे तो थर्रायेंगे ।
काँप उठती है रूह बदन की
शेर जहाँ चिल्लाते हैं
हिन्दुस्तान की धरती पे आतड़्की
मारे जाते हैं ।।

हिन्दू न , मुस्लिम हम न ही
सिख और ईसाई हैं,
भारत माँ के लाल हैं हम
हम सबकी दौलत माई है ।
हैं सपूत या हैं कपूत
हम सबसे प्यार जताती हैं ,
इसीलिए भारत माता
हम सबके हृदय समाती हैं ।।

बाइबिल क्या है ? धर्म ग्रन्थ क्या ?
तुझे कुरान पढ़ाउँगा ,
सन्ध्या, पूजा करना कैसे
वेद , पुरान सिखाउँगा ।
हम लोगों पर शक हो तो
बस एक बार संकेत करो ,
हृदय - चीर के एक - एक में
हिन्दुस्तान दिखाउँगा ।।
मैं हृदय - चीर के एक - एक में
हिन्दुस्तान दिखाउँगा ।।
           
                     "  जय हिन्द   "


20/07/2016

" स्रोतस्विनी बन जाइए "

स्रोतस्विनी बन जाइये ,
हमको बहा ले जाइये ।।

मानस - पटल के भाव में,
हृदयस्थ आविर्भाव में,
मेरे रोम - रोम में आइये ।।

इस प्लवन रूपी भार को,
स्वच्छन्द इस संसार को,
अब आप आके बचाइये ।।

नव रसों से सब युक्त हों ,
परिवार सब संयुक्त हों ,
सौहार्द - भाव बढ़ाइये ।।

पंक्षियों को उन्मुक्त कर ,
आवास भी उपयुक्त कर ,
उनके भी शरण में जाइये ।।

दारुण - हृदय के शोक को ,
निष्पाप बाँझिन कोख को,
फल - फूल से भर जाइये ।।

भागीरथी , ओ नर्मदा ,
पुण्यप्रदा , माँ शारदा ,
साहसिक सबको बनाइये ।।

हे शिरोभूषण धारिणी ,
कल्याणिनी ,हे कमलिनी ,
बस ज्ञान - दीप जलाइये ।।

स्रोतस्विनी बन जाइये
हमको बहा ले जाइये ।।

" जी चाहता है "

जी चाहता है के बालों से तेरे मैं खेलूँ सुबह - शाम उसमें बिता दूँ,
जी चाहता है के गालों कि तेरी चढ़ी लालिमा को मैं दुल्हन बना लूँ ।
जी चाहता है के होंठों के रस को मैं अमृत बना के अधर पे सजा लूँ ,
जी चाहता है के बाँहों में तेरे नया और नया आशियाना बना लूँ ।।

जी चाहता है के हाँथों में तेरे स्वकर को मैं देकर के खुद को बचा लूँ ,
जी चाहता है के आँखों में तेरे मैं डूबूँ, सुबह - शाम उसमें नहा लूँ ।
जी चाहता है के आँसू को तेरे मैं मदिरा बना के गले में दबा लूँ  ,
जी चाहता है के आँचल में तेरे मैं सोऊँ, जहाँ को उसी में सुला लूँ ।।

जी चाहता है के आँधी बनूँ मैं, हो इतनी ही ताकत कि तुझको उड़ा लूँ,
जी चाहता है के बारिश बनूँ मैं हो इतना ही जल कि मैं तुझपे बरस लूँ ।
जी चाहता है के ओढूँ, बिछाऊँ तुझे अपना बिस्तर और चद्दर बना लूँ,
जी चाहता है के प्रकृति मैं बनकर सदा, सर्वदा तुझको अपने में ढ़क लूँ ।।

" देखता हूँ "

देखता हूँ, मनीषियों को "वसुधैव कुटुम्बकम्" का नारा लगाते
खुशी मिलती है,
देखता हूँ उन्हीं आचार्यों को किसी के अवसान पश्चात सभागारों में दुःख व्यक्त करते वक्त विषाद से युक्त चेहरा और आँखों में आँसू ,सुकून मिलता है लगता है कि सम्वेदना अभी है कहीं न कहीं,
विद्वत्गणों का अपनत्व दिखता है, पर देखता हूँ कुछ प्रतिभा सम्पन्न आचार्यों को शोक व्यक्त करते समय भी क्लिष्ट भाषा का प्रयोग कर अपनी विद्वता  का परिचय देते हुए,
सोंचता हूँ, इनकी भाषा ही ऐसी होगी, पर सुनता हूँ, उन्हें सभागारों के बाहर परस्पर ये कहते कि "कैसे बोला मैं " दुःख होता है,
लगने लगता है ,यह सब मात्र दिखावा है, मिथ्यास्तुति है,
महसूस ही नही होने देते कि यह सब औपचारिक है ।
पर इतना ही नही देखा मैंने ,करुणा के सागर हुए व्यक्ति, दोस्त मित्र
की आँखों से बड़ी - बड़ी बूँदें छलकते हुए भी मैंने देखा है ।।
मैंने देखा है "वसुधैव कुटुम्बकम् "का नारा लगाते हुए भी मैंने देखा है ।।

"मैं, मेरी हार और तुम "

वन, उपवन, गिरि, कानन, कुञ्ज,पराग, सुराग, तड़ाग में हो।
तुम निर्मल, जल,थल, फल और मेरे सकल भाग में हो ।।

सरल,समीर, सरस, सरसुन्दर इन्दु सदृश तुम बिन्दु भी हो ।
तुम अमिट, अजेय, अनन्त, अखण्ड मेरे जीवन के आनन्द में हो ।।

ग्रीष्म, शरद, वर्षा, हेमन्त, शिषिर और वसन्त में हो ।
तुम शरद पूर्णिमा के जैसी मेरे सुख दुःख के सम्बन्ध में हो ।।

विह्वल, विमल, विकल, विश्वासी मेरे पापों के अविनाशी हो ।
तुम गंगा, यमुना, सरस्वती मेरे दीपक की तुम बाती हो ।।

है प्यार अद्भुत और अलौकिक पर रखती नही जरा सी हो ।
तुम हरिद्वार, केदारनाथ, अयोध्या, और मेरी काशी हो ।।

तुम अनुपम सुन्दर वेश बनाकर करती मुझको दीवाना ।
मैं आपकी यादों में खोया और जगत से हुआ बेगाना  ।।

आवारा हूँ, बेगाना हूँ, हमेशा ही मैं हारा हूँ ।
कहते न बनती ये बातें किसका मैं हुआ सहारा हूँ  ।।

तुम नये हो इस जगत में जीतकर की हो मुझे खुश ।
हूँ अकेला इस जगत में और तुम्हारी यादें हैं बस ।।

"अपनी जिन्दगी की कली खिले, न खिले पर
  आपकी जिन्दगी पुष्पमय कर दें ।।"

19/07/2016

" गीत "

अजनबी शहर में अजनबी राह पर
अजनबी से मुलाकात होने लगी ।
अजनबी वो भी थे अजनबी हम भी थे
अजनबी से जरा बात होने लगी ।।

धीरे - धीरे बढ़ा सिलसिला बातों का
बातों - बातों में हम पास आने लगे ।
आये वो पास मेरे तो स्नेहित हुआ
और भी पास आये चाहत बढ़ी ।।

चाहतों का रहा न ठिकाना वहाँ
चाहतें आसमाँ पे थी पहुँची हुई ।
आसमाँ पे पहुँच तो गया मैं मगर
अब उतरने का कोई बहाना न था ।।

एक दिन बाग में आये वो प्यार से
कह दिये अजनबी हो, रहो अजनबी ।
सन्न हो मैं गया कुछ भी कह न सका
अजनबी हो गया मैं उसी शाम से ।।

अजनबी हो गया मैं मगर दिल मेरा
आज भी उनकी यादों में गुम हो रहा ।
मेरी चाहत अभी भी है तुमसे सनम
अब तो मिलने का कोई बहाना न था ।।

अजनबी शहर में अजनबी राह पर
अजनबी से मुलाकात होने लगी ।
अजनबी वो भी थे अजनबी हम भी थे
अजनबी से जरा बात होने लगी ।।

" हिजड़ो की संख्या बहुत भरी है भारत में "

हिजड़ो की संख्या बहुत भरी है भारत में ।
पिजड़ो में बन्द हैं कई हुए शरारत में ।।

अब देश विरोधी नारे लगते दिल्ली में,
सामान मिले हम लोगों को सब झिल्ली में ।
सब कामचोर हो कहते , हूँ मैं हरारत में,
हिजड़ो की संख्या बहुत भरी है भारत में ।।1।।

लड़कियों के संग व्यवहार - अनर्गल करते हैं,
भौजी,भाभी और माल कहा वो करते हैं ।
कहने को मात्र युवा हैं बाकी प्रायः नशे के हालत में,
हिजड़ो की संख्या बहुत भरी है भारत में  ।।2।।

यह पुलिस - प्रशासन उनका न कुछ करती है,
डंडा, बन्दूख, तोप भी रखके डरती है ।
डर जाते हैं नयनों के एक इशारत में,
हिजड़ो की संख्या बहुत भरी है भारत में ।।3।।

कुछ नीच और कुछ महानीच जो बैठते हैं,
अधिकार माँगने पर जनता से ऐंठते हैं ।
हर पाँच साल में हाथ जोड़ने की हालत में,
हिजड़ो की संख्या बहुत भरी है भारत में ।।4।।

हैं कई लोग भूखे मरते, रहने को पास जगह न है,
जैसे विधि ने हो कष्ट लिखा उनको कष्टों को सहना है ।
एसी जब रूम में चलती है तब जा सोते हैं इमारत में,
हिजड़ो की संख्या बहुत भरी है भारत में ।।5।।

नापाक ओवैशी जैसे कितने दोगले हैं,
जो अपनी माँ को माँ न समझे वो गले हैं ।
भारत को खत्म करने के हैं ये चाहत में,
हिजड़ो की संख्या बहुत भरी है भारत में ।।6।।

अब पाकिस्तानी झण्डा खुल के लहरेगा,
जब काश्मीर उनके जा देश में ठहरेगा ।
लगता है हिन्दुस्तान को पाकिस्तान बनाने के इजाजत में,
हिजड़ो की संख्या बहुत भरी है भारत में ।।7।।


" हिन्दुस्तान "

जी चाहे है जीवन को मैं एक नया इन्सान बना दूँ ,
देखूँ मैं आतंक जहाँ भी जगह को उस शमशान बना दूँ ।
हो जाऊँ मैं निठुर हठी जब समझाने से वो न समझें,
पाकिस्तानी धरती पे मैं दूसरा हिन्दुस्तान बना दूँ ।।1।।

जितनों के मुख में गाली है अब जुबान उनकी अटका दूँ ,
राष्ट्रद्रोह करने वालों को सब मिल शूली पे लटका दूँ ।
हों कितने परमाणु,मिसाइल हमको नही डरा सकते हो,
कभी मिलो मुझसे प्यारे! तो मैं अपनी औकात दिखा दूँ ।।2।।

कलह,क्लेश,कपटी लोगों में प्रेम का मैं इक दीप जला दूँ ,
मुझमें इतनी शक्ति भरो कि भारत को मैं नई कला दूँ ।
हो खुशहाल सभी का जीवन ऐसा कुछ वरदान मुझे दो,
इस समग्र-संसार तमस को एक बार मैं पुनः जला दूँ ।।3।।

जीवन है आतंकित भय से स्वयं में मैं अभिमान जगा दूँ ,
एक नही सौ-सौ फायर हों इतना मैं बलवान बना दूँ ।
राष्ट्रभक्ति में अगर कलम सर होने की नौबत आए तो ,
ईश्वर शक्ति मुझे देना कि अपना मैं बलिदान चढ़ा दूँ ।।4।।

बुद्धि को परिमार्जित कर दो एक नया संसार बना दूँ ,
निश्छल और निष्कपट गरीबों का अच्छा घर-द्वार बना दूँ ।
जब तक रहूँ जिऊँ ऐसे ही, ऐसा कुछ वरदान मुझे दो,
हिन्दुस्तान की धरती को मैं विश्वविजय का हार चढ़ा दूँ ।।5।।

गज़ल

एक निर्णय ले लिए फिर क्या फ़रक पड़ता खुदा या तो जन्नत राह होगी या तो दोजख का सफर जिन्दगी को आग की दरिया पे है रखना मुझे या तो मेरी ...