18/10/2016

न्याय के विरूद्ध

टूट जाती है उसकी कमर
गिर जाती है
गिड़गिड़ाते ,
भागते ,
रेंगते
हुए
किसी अदालत की चौखट पे
उन चिंथे हुए
कपड़ों में ,
जिनमें दिख रही है
उसकी पूरी की पूरी
नंगी शरीर ,
जिसे लोग
बड़ी ही उत्सुकता से देखते हैं।

खटखटाती है अदालत का दरवाजा
और
कुछ बिन खटखटाये ही
तोड़ देती हैं दम।

सुनी जाती हैं बातें
दोनों पक्षों की
पर उधेड़ी जाती हैं
बची - खुची चमड़ियां
कुछ पैसों से
दबे हुए
वकीलों के अनैतिक सवालों से
ऐसे न्याय से ,
जिसे मैं स्पष्ट और शुद्ध लिखता हूँ।
इसीलिए ऐसे न्याय के विरूद्ध लिखता हूँ।।

16/10/2016

कविता बीमार पड़ी

कविताओं की आपाधापी में
कविता बीमार पड़ी।
पूरी सत्ता लचर गई है
कलम आज बेकार पड़ी।।

बेटे जन्म दिये सुख काटी
अपनी सारी खुशियाँ बाँटी
आज हुई वो बुढ़िया जैसे ,
खटिया पे लाचार पड़ी।।

ठण्डी से वह ठिठुर गई थी
सिमटी थी ,वो बटुर गई थी।
तन पे लत्ता एक नही था ,
उसे सर्द की मार पड़ी।।

सरहद पे हैं चली गोलियाँ
खाली कर दी,भरी झोलियाँ।
देख सकी न हिन्दू,मुस्लिम
दिल पे गोली चार पड़ी।।

सारे कपड़े चीर दिये थे
चोट बहुत गम्भीर दिये थे।
ऐसा हश्र किये हैं उसका,
मृत आधी बेदार पड़ी।।

लाल सायरन बजा रहे हैं
नीली बत्ती जला रहे हैं।
नंगी लाश मिली है मुझको
जो थी गंगा-पार पड़ी।।

कब तक आखिर लड़े लड़ाई
कब तक ऐसी करें पढ़ाई।
मुझको रास नही आती है
औंधे मुँह सरकार पड़ी।।


मेरी ज़िन्दगी में तुम , कुछ यूँ आओ ( Lyrics )

मेरी ज़िन्दगी में तुम , कुछ यूँ आओ कि मेरी सुब्ह - शाम हो जाए कि मेरे दिन - रात हो जाएँ मैं भीगूँ बाँहों में तेरी कि यूँ बरसात हो जाए ह...