30/11/2017

गज़ल



एक निर्णय ले लिए फिर क्या फ़रक पड़ता खुदा
या तो जन्नत राह होगी या तो दोजख का सफर

जिन्दगी को आग की दरिया पे है रखना मुझे
या तो मेरी मौत होगी या रहूँगा मैं अमर

हर कदम पे ले रहे हैं वो परीक्षाएँ मेरी
तुम कहो ! मैं इश्क़ कह दूँ या कहूँ इसको समर

चाँद देखो छिप गया है सूर्य दीवाना सा है
मेरा क्या होगा बताओ आज तुम आई अगर

जो हमेशा दिल की बातें सोंचता, सुनता रहा
आ गया जाने कहाँ से बुद्धिमानों के शहर

चाँद से ऊपर पहुँच कर सूर्य पर रख दूँ कदम
मेरे सारे ख़्वाब जो सजकर बिखर जाएँ इधर

अपनी भी कुछ ख्वाहिशें हैं अपने भी कुछ स्वप्न हैं
छोड़कर इनको बताओ आप ही जाऊँ किधर 

14/11/2017

ज़िक्र होता है तेरा हर बात में

मैं तुम्हारे प्यार की बरसात में
भीग जाऊँगा तुम्हारी याद में

जन्नतें मेरे लिए शायद नही
तू मेरी जन्नत तु ही फ़रियाद में

तुम नदी सी आ मिलो उस छोर पे
मैं समुन्दर सा मिलूँ आजाद मैं

इस दिलो - दीमाग में क्या कर गई
ज़िक्र होता है तेरा हर बात में

हुश्न शोला , होंठ शबनम , आँख हैं दरिया कोई
चाहता हूँ डूब के मरना , जियूँगा बाद में 

30/10/2017

कभी - कभी मेरे गीतों को गुनगुनाया करो ( गज़ल )

कभी - कभी मेरे तुम पास भी तो आया करो
कभी - कभी मेरे होंठों से मुस्कुराया करो

मेरी जुबाँ में सदा नाम तेरा रहता है
कभी - कभी मेरे गीतों को गुनगुनाया करो

कि वो तुम्हारी हर इक साँसें मुझपे गिर्वी हैं
कभी - कभी अपनी साँसें मुझसे ले जाया करो

मैंने अक्सर तुम्हें इस दिल की गली में देखा
कभी - कभी अपने दिल में मुझे बसाया करो

मेरी हर सुब्ह - शाम ढलती है यादों में तेरी
कभी - कभी मुझे अपना भी दिन बनाया करो

मैं फ़लक से भी तोड़ लाऊँ चाँद - तारों को
कभी - कभी मेरा जो साथ तुम निभाया करो

इश्क काफ़िर नही मेरा मुझे मालूम है पर
कभी - कभी मुझे ख़ुद से भी तो मिलाया करो 

26/10/2017

ख़ुद के सपनों में ही खुद को देख तू ( गज़ल )

ये जमीं और आसमाँ कर एक तू
यूँ न हिम्मत हार लड़कर देख तू

तोड़ दे चट्टान भी आये अगर
इस समर में एक भाला फेंक तू

वो तेरे पैरों तले आ जाएँगें
इक कदम आगे निकल कर देख तू

जीत लोगे सब  तुम्हारा है ज़रा 
ज़िन्दगी से डर हटाकर देख तू

क्या रखा है उस बड़े प्रासाद में
आत्मा में झाँक यारा देख तू

सब गिले शिक़वे यहाँ मिट जाएँगें
इस जहाँ में प्यार भर कर देख तू

ख़ुद ब ख़ुद किश्मत बदल जायेगी बस
ख़ुद के सपनों में ही खुद को देख तू

ये जमीं और आसमाँ कर एक तू
यूँ न हिम्मत हार लड़कर देख तू

तोड़ दे चट्टान भी आये अगर
इस समर में एक भाला फेंक तू


23/10/2017

तू जो आया , तो ख़ुदा भी आया ( गज़ल )

तेरी ज़ुल्फ़ों से हवा का झोंका आया - 2
ऐसा लगता है जैसे कोई नगमा आया

दूर मुझसे थे अभी तक मेरे अहल ए वफ़ा
तू जो आया , तो ख़ुदा भी आया

सारे रिश्ते , सभी नातों नें ठुकराया मुझे
जब नहीं था कोई मेरे पास तो , तू आया

धूप में यूँ ही भटकता रहा सपनें लेकर
छाँव की चाह में अक्सर तेरा आँचल आया

कभी बीमार हुआ जो मैं, ऐ मेरे हमदम !
डबडबाई तेरी आँखों में आँसू आया

वो इबादत चली मेरे संग मेरी दुल्हन बन
तूने जो की थी उसी से मुझमें रंग आया

लोग आख़िर कभी समझे ही नहीं लफ्ज़ ए बयाँ
तूनें समझा यही काफ़ी है ,सब हाँथ आया 

तेरी ज़ुल्फ़ों से हवा का झोंका आया
ऐसा लगता है जैसे कोई नगमा आया

दूर मुझसे थे अभी तक मेरे अहल ए वफ़ा
तू जो आया , तो ख़ुदा भी आया


18/10/2017

मेरी ज़िन्दगी में तुम , कुछ यूँ आओ ( Lyrics )

मेरी ज़िन्दगी में तुम , कुछ यूँ आओ
कि मेरी सुब्ह - शाम हो जाए
कि मेरे दिन - रात हो जाएँ
मैं भीगूँ बाँहों में तेरी
कि यूँ बरसात हो जाए
हो जाए ऽऽ , हो जाए ऽऽ

मेरी ज़िन्दगी में तुम , कुछ यूँ आओ
तेरा चेहरा दिखे हर पल
तेरे संग आज़ गुज़रें कल
तेरी परछाईं बन घूमूँ
तुम्हें चाहूँ , तुम्हें पूजूँ
मैं पूजूँ  ऽऽऽ, मैं पूजूँ  ऽऽ


so now it is not complete when i'll complete it then i'll remove this particular line .....
Thank You .  

17/10/2017

तुम आँखों से यूँ देखो मैं दिल देखता हूँ ( its totally lyrics )


तुम आँखों से यूँ देखो मैं दिल से देखता हूँ -2
तेरी यादों की बारिश में तेरे संऽऽभीऽगता हूँऽऽ

यूँ आँखों से तुम देखो मैं दिल से देखता हूँ   ( For boy )

तुम आँखों से यूँ देखो मैं दिल देखती हूँ -2  
तेरे ख़्वाबों की मंज़िल तेरे संग देखती हूँ

यूँ आँखों से तुम देखो मैं दिल से देखती हूँ ( for girl )

अँगड़ाई लेती लहरें शाहिल से टकराती हैं 
इतना तुझको मैं चाहूँ हर पल तू याद आती है 
कितना गहरा है सागर कितना ऊपर है अम्बर 
जो तू संग - संग चल दे तो, मैं मिल देखता हूँऽऽऽ ( for boy )

तुम आँखों से यूँ देखो मैं दिल से देखता हूँ -2 

तू हवा के झोंके जैसा मेरे दिल का चैन चुराए 
तू आये ऐसे दिल में मुझको पागल कर जाए 
दीदार तेरा करना है तुझ संग जीना मरना है 
तू पास जरा आए तो, मैं मिल के देखती हूँऽऽऽ ( for girl )

तुम आँखों से यूँ देखो मैं से दिल देखती हूँ -2 

तेरी यादों की बारिश में तेरे संऽऽग भीऽगता हूँऽऽ  ( For boy )
तेरे ख़्वाबों की मंज़िल तेरे  संग देखती हूँऽऽ  ( for girl )

यूँ आँखों से तुम देखो मैं दिल से देखता हूँ  ( For boy )
यूँ आँखों से तुम देखो मैं दिल से देखती हूँ ( for girl )

यूँ आँखों से तुम देखो मैं दिल से देखती हूँ ( Both )


हर मुश्किलें जो तेरी वो मेरी ( type of lyrics )

हर मुश्किलें जो तेरी वो मेरी
हर मंज़िलें जो तेरी वो मेरी

जाओ जहाँ संग - संग मैं रहूँ
इतनी सी बस ख़्वाहिशें हैं मेरी   ( these lines for girl )

समझो ना तुम मेरे दिल की ज़फ़ा
पास रहोगी तुम्हीं तुम सदा

कैसे तुम्हें भूल पाउँगा मैं
आवाज़ दूँगा ,बुलाऊँगा मैं  ( ....for boys )

दिल में मेरे तुम यूँ  आ जाना
जैसे लकीरें हाँथों में        ( for girl )

वादा है तुमसे जानेमन
हाँ , हम जियेंगे साथ में  ( for boys )

its not now complete now i'm working on this work .... 

15/10/2017

याद अभी है

तुमको घर तक छोड़ के आना याद अभी है
तुमसे दिल के राज़ बताना याद अभी है

इक संसार मेरा था बचपन की यादों का
उसमें तेरा झूम के आना याद अभी है

घर के कोने - कोने में यूँ दौड़ - भागकर
वो तेरा पायल छनकाना याद अभी है

दिल में मेरे दर्द उट्ठा था तेजी से कुछ
और तेरा वो दौड़ के आना याद अभी है

हुश्न - मुहब्बत जलवे तेरे सारे संग थे
ऐसे में बारिश का आना याद अभी है

नादानी करता था जब मैं  जानबूझ कर
और तेरा बातें समझाना याद अभी है

गुम हो जाऊंगा इक दिन ये मुल्क छोड़ कर
फिर मत कहना इक दीवाना याद अभी है

  

याद हैं

हौले - हौले इश्क़ में वो दिल लगाना याद है
याद है हमको अभी भी वो ज़माना  याद है

रात में तनहाइयाँ आकर सताती हैं मगर
देखना मुझको तेरा वो मुस्कुराना याद है

याद हैं मुझको अभी अँगड़ाइयाँ  भरना तेरा
हाँथ से आँखों पे वो पर्दा लगाना याद है

एक आहट जो तेरी आती है मुझको हर जगह
वो तेरा पीछे से आ मुझको सताना याद है

शाम होते ही तेरी आँखों की वो नजरें - बयाँ
और बागों में तेरा मिलना - मिलाना याद है

इस जगह से उस जगह की दूरियाँ काफ़ी मगर
वो तेरी बचपन की इक तस्वीर पाना याद है

इश्क़ अपना यूँ मुकम्मल ही रहा है  उम्र - भर
लाख़ - तूफ़ानों का आना और जाना याद है

सोंचता था एक मैं ही प्यार करता हूँ तुझे
वो मेरी तस्वीर को दिल से लगाना याद है

11/09/2017

तू चली आ , तू चली आ , तू चली आ अब यहाँ ( गज़ल )

मैं अधूरे ख़्वाब लेकर के बता जाऊँ कहाँ
तू चली आ , तू चली आ , तू चली आ अब यहाँ - 2

मैं कहूँ कैसे तुम्हारी आरज़ू हमको नही
चाहता हूँ मैं तुम्हें तुमसे बग़ावत है नही
किस कदर तुमसे कहूँ अपने दिलों की दास्ताँ ।। तू चली आ ....

छुप - छुपा कर देखता तुझको शज़र की छाँव में
डूब जाता हूँ मैं अक्सर उस शहर ,उस गाँव में
हैं तेरी यादें यहाँ करती मेरे मौसम जवाँ ।। तू चली आ ....

आज हो जैसे युँ ही रहना सदा तुम उम्रभर
ज़िन्दगी आसान होगी कट सकेगा ये सफर
साथ ग़र देती रही बनता रहेगा आशियाँ ।। तू चली आ ....

याद हैं मुझको तेरे चेहरे की वो ख़ामोशियाँ
तू सदा करती रही नज़रों से ही लफ़्ज़े - बयाँ
वो घड़ी , वो पल कटे कैसे हमारे दरमियाँ ऽऽऽ  ।। तू चली आ .....

भावनाओं की नदी में डूबकर हूँ सीखता
मैं घने - बादल तले अक्सर तेरे संग भीगता
यूँ गिराया ना करो ज़ुल्फों से काली बिजलियाँ ।।

तू चली आ , तू चली आ , तू चली आ अब यहाँ

मैं अधूरे ख़्वाब लेकर के बता जाऊँ कहाँ
तू चली आ , तू चली आ , तू चली आ अब यहाँ ।।

06/09/2017

कहीं चिराग जल गया शायद

आज अनन्त चतुर्दशी और शिक्षक दिवस के अवसर पर बड़े भइया और भाभी को पुत्ररत्न की प्राप्ति हुई अतः समूचे घर में उल्लास का माहौल छाया हुआ है मुझे पूरा विश्वास है कि आज मेरे पिताजी की मूछें पहले से थोड़ी टाइट और छाती पहले से कुछ और चौड़ी होगी, भइया मन ही मन खुशी से झूम रहे होंगे कि जैसे झूमती हैं लहलहाती हरी फसलें खेतों में, भाभी जी आज अपार कष्ट के बाद एक अलौकिक सुख का अनुभव कर रही होंगी बाबा आजी ,दादा दादी, चाचा चाची और सभी भाइयों भाभियों सहित बहनों में एक खुशी की लहर दौड़ रही होगी मैं बाहर (केरल) हूँ पर मुझे मालूम इस समय मेरे घर का माहौल कैसा होगा -

(मैं यहाँ बाहर हूँ पर मुझको पता है सब यहाँ
किस कदर छाया हुआ होगा मेरे घर कारवाँ )
                           नीलेन्द्र शुक्ल " नील "

कहीं पे फूल खिल गया शायद
कहीं गुलशन महक उठा शायद

मेरे पापा ख़ुशी से झूम उठे ,
कहीं चिराग जल गया शायद

जिसे थे खोजते हम रात के अंधेरों में
आज घर चाँद आ गया शायद

कई दिन बीत गए इन्तज़ार में जिसके
वही मेहमान आ गया शायद ।।

मेरे पापा = बच्चे के बाबा जी ( दादा जी )
                  

19/08/2017

जन्मदिन

जन्मदिन के इस सुअवसर पे तुम्हें अर्पण करूँ क्या
देख लो मेरे हृदय को भावना दर्पण करूँ क्या

पूँछता हूँ मैं अकिंचन आज अपने यार से
बाँट दूँ यह विश्व सारा या समेटूँ प्यार से
शब्द हैं, कुछ अर्थ हैं, कुछ भावनाओं के कुसुम
ला बिछाऊँ आज मैं पैरों तले गुलजार से
बौर की देखो छटा है माह ये ऋतुराज का
दिव्य - मेधा हो प्रभा आलोक हो गणराज का
जिन्दगी सारी खुशी दे जो तुम्हें मंजूर हो
और सारे कष्ट जो भी हैं या हों वो दूर हों
राष्ट्र में हो कीर्ति तेरी राष्ट्र यह वंदन करे
राष्ट्र पे हो तू निछावर राष्ट्र अभिनन्दन करे ।

भावना की बूँद हैं इससे अधिक वर्षण करूँ क्या ।।


19/07/2017

मुहब्बत के वास्ते

दुनिया तू घूमता रहा शोहरत के वास्ते
दो - चार गज़ल बोल मुहब्बत के वास्ते

पर्वत,पठार,पेड़ ,नदी और झरोखे ,
भारत बचाए रख तू इबादत के वास्ते

हो प्रेम बेहिसाब एक - दूजे मुल्क से
इंसान बन जरा तू शराफत के वास्ते

इस देश की रक्षा में अगर प्राण भी जाँए
मिट जाऊँ सर कलम हो शहादत के वास्ते


16/06/2017

तुम्हारे चेहरे पर


                            रूपों का विस्तार तुम्हारे चेहरे पर
                            दिखता माँ सा प्यार तुम्हारे चेहरे पर
                            कैसे खुद को रोक सकूँ ,मेरी दुनिया
                            लुट जाए सौ बार तुम्हारे चेहरे पर

                            छोटी बिंदिया माथे पर ऐसे सोहे
                            हों सोलह श्रृंगार तुम्हारे चेहरे पर

                           जब से होंठों ने होंठों को पाया है
                           तब से है त्यौहार तुम्हारे चेहरे पर

                           वर्णन करने में ये छह की छह ऋतुएँ
                           कम पड़ती सरकार तुम्हारे चेहरे पर

                           कान्हा बनकर घूँमूँ तेरी यादों में
                           दिखी राधिका चार तुम्हारे चेहरे पर

                           तेरी गोदी में माँ के आँचल का सुख
                           दिखता प्रेम अपार तुम्हारे चेहरे पर

                           जी करता है जन्मदिवस के अवसर पर
                           लिख दूँ सारा प्यार तुम्हारे चेहरे पर ।।


अपने जन्मदिन (19 जून) के अवसर पर तुम्हारे लिए
एक छोटी सी रचना इस उद्देश्य से कि मेरी
काल्पनिक दुनिया में हमेशा तुम इसी
तरह अपनी यादों के साथ मुझे सजाती रहना
इससे भी गम्भीर विचार देना,अपनी यादों से
लबरेज़ रखना कि हमेशा तरोताज़ा रहूँ मैं
तुम्हारी यादें ही तो हैं जो मुझे ताकत देती हैं
किसी भी कार्य को बेहद सलीके से करने में
तुम्हारा प्यार आकाश की तरह है जो मुझे
ढक रखा है ,तुम्हारी यादें सागर की लहरों की तरह हैं
जो मेरे हृदय को और झकझोरती हैं तरड़्गित करती हैं ।।

30/04/2017

बना सकती हो क्या

मुझको अपना मेहमान बना सकती हो क्या ?
मुझसे थोड़ी पहचान बना सकती हो क्या ?

जिसको भगवान बनाओ उसको पूजो पर
मुझको भोला इन्सान बना सकती हो क्या ?

मैं मन्दिर ,मस्जिद गिरिजाघर को क्यों जाऊँ
खुद को मेरा भगवान बना सकती हो क्या ?

मैं गिनता हूँ उन्मुक्त गगन में तारों को
खुद को तुम मेरा चाँद बना सकती हो क्या ?

छोड़ो सारा संसार गजब की दुनिया है
होंठों से छूकर जान बना सकती हो क्या ?

यूँ मत खोजो दुनिया में अंधे लोगों को
मुझको देखो पति-प्राण बना सकती हो क्या ?

26/04/2017

बहुत हैं

अल्लाह तेरी नज़र में बेशुमार बहुत हैं
ईश्वर नही दिखे कहीं दरबार बहुत हैं ।
इक मैं ही नही प्यार करके पाप किया हूँ ,
धरती पे मेरे जैसे गुनाहगार बहुत हैं

नज़रें जमाए देखती है हुश्न - मुहब्बत
मुझ जैसे उस नज़र में गिरफ्तार बहुत हैं

इस देश की हमदर्द निगाहों से मदद लो
सब नीच ही नही हैं मददगार बहुत हैं

गाँवों की दशा देख शहर ही भला लगे
घर कम ही देखता हूँ मैं दीवार बहुत हैं

माँ की दुवाएँ साथ हैं, बहनों की इबादत
गुस्से भरे पिता हैं मगर प्यार बहुत है

दाढ़ी,जटाएँ देख के भरम में मत पड़ो
पाखण्डियों के नाम बलात्कार बहुत हैं

बहनों की , बेटियों की यूँ इज्जत से न खेलो
शहरों में हवस के लिए बाज़ार बहुत हैं

गैरों का खाके कब तलक आराम करोगे
बाँटो तो सही ,देश में हकदार बहुत हैं

इसका कभी उसका हूँ सदा रोल निभाया
चेहरा है एक दोस्तों किरदार बहुत हैं

दिल से मिला हूँ सबसे नही बुद्धि लगाई
वो सोंचते हैं खुद को समझदार बहुत हैं

हर पाँच - वर्ष बाद दिखें हाँथ जोड़कर
भारत में दिखी नक्कटी सरकार बहुत हैं

दूजे के काँध रख के मियाँ ट्रिगर दबाएँ
इक " नील " तू ही मूर्ख होशियार बहुत हैं ।।

16/04/2017

न जाने कल कहाँ ये दोस्त तेरी दीक्षा हो

प्रिय बचपन की दोस्त दीक्षा मिश्रा जी के लिए उनके विशेष
आग्रह पर उनको समर्पित  -------

महकती हो सदा फूलों सी वो ऐसी फिज़ा हो
खुले हों जुल्फ लहराती हुई कोई निशाँ हो ,
चमकती,चमचमाती धूप हो जैसे शरद की
सुनहरी शान्त सी कोमल हमारी दीक्षा हो ।।

नही चन्दा ,नही सूरज ,नही गुलनार माँगू
सदा खुशियों भरी, पावन पवन वो,दीक्षा हो ।।

अधूरी एक भी किरणें नही टकराएँ उससे,
कि छनकर जाएँ जिसपे रोशनी वो दीक्षा हो ।।

सभी हों राह ऐसी आज जिसपे पैर तेरा
पड़ें ,बिछ जाएँ सारे फूल जिसपे दीक्षा हो ।।

मिटें नापाक वो सारी सभी की भावनाएँ
कि जिसकी सोंच पे बैठी हुई ये दीक्षा हो ।।

बड़ी हसरत,बड़ी चाहत,बड़ा महफूज़ हूँ मैं
जिसे महफूज़ तुम रखना हमारी दीक्षा हो ।।

बहुत शीतल हिलोरें मारती हैं भावनाएँ
कि हो गरमी में जो बदरी सदृश वो,दीक्षा हो ।।

चलो अब नील तुम भी साथ चल लो ,
न जाने कल कहाँ ये दोस्त तेरी दीक्षा हो ।।

14/04/2017

कोशिश करता हूँ

लिखने और मिटाने की मैं कोशिश करता हूँ ,
अक्सर तुझको पाने की मैं कोशिश करता हूँ

सूरज,चन्दा,फूल,खिलौने डालूँ तेरी झोली में
तुझमें खुद मैं घुल जाने की कोशिश करता हूँ

माँ के चरणों की गाथाएँ बाबू जी का प्यार
सुबह-सवेरे दोहराने की कोशिश करता हूँ

बहनें हों उन्मुक्त हमारी जितना चाहें पढ़ पाएँ,
बाबू जी को समझाने की कोशिश करता हूँ

चाचा चाची,मामा मामी,भाई भौजी सब
सारे रिस्तों को पाने की कोशिश करता हूँ

शहरों में वो बात कहाँ जो गाँवों की अमराई में
फिर अपने घर को जाने की कोशिश करता हूँ

जन्नत - स्वर्ग की बातें अद्भुत कौन देख पाया अब तक
इक दूजे को सुलझाने की कोशिश करता हूँ

जिनसे आँखें डरती आई जीवन के हर मंज़र पे ,
उनसे आँख मिलाने की मैं कोशिश करता हूँ ।।

जब - जब अपना रूप बिगाड़ी तानाशाही सरकारें,
तब - तब मैं खुद टकराने की कोशिश करता हूँ ।।

30/03/2017

हाशिए पर गंगा

माँ,
मैं देख रहा हूँ
तुम्हारी पीड़ा,तुम्हारे कष्ट

मैं देख रहा हूँ ,
कि कैसे तुम्हारे हृदय पे करती हैं चोट ,
मथ देती हैं तुम्हारे पेट को
झकझोर देती हैं पूरी की पूरी शरीर
ये आधुनिक नावें,
काला कर चुकी हैं समूचे जल को अपने धुआँ से ।

मैं देख रहा हूँ ,
कि कैसे तुम्हारे नाम पे खेली जा रही है
ओछी - राजनीति ,
खर्च किए जा रहे हैं हजारों करोड़ रूपये
पवित्रता ,स्वच्छता और निर्मल बनाने का नाम दे - देकर ।

क्या किसी ने कभी अपनी माँ से राजनीति खेली है क्या ?

मैं देख रहा हूँ कि लगातार
तुम धंसती जा रही हो राजनीतिक - दलदल में
जहाँ लोग तुम्हारा सहारा नही बन रहे हैं
अपितु दिखा रहे हैं तुम्हें हाँथ
औपचारिकता पूरी करने के लिए
तुम्हारे नाम पर गद्दी पे बने रहने के लिए ।

माँ,
मैं देख रहा हूँ ,
कि कैसे दोहन हो रहा है तुम्हारा
इस ग्लोब्लाइजेशन के दौर में ।
लगातार तुम्हारी कोख में फेंका जा रहा है
कचरा ,तैर रहा है मैला
और तो और मुर्दे भी तैरते दिख जाते हैं कभी - कभी ।

शहर के कल - कारखाने ,फैक्ट्रियाँ
और असंख्य गंदी नालियाँ तुमसे आके मिलती हैं
प्रदूषित करती हैं तुम्हें ,
और तुम बड़ी ही सहजता से स्वीकारती हो उन्हें,
सहती हो ।

टूट गई हैं तुम्हारी लहरें
समाप्त होता जा रहा है तुम्हारा जल
अब मैं तुम्हें बूढ़ी कहूँ या बीमार
कुछ सूझता नही है ।

अब तुम ही कहो
मैं तुम्हारा चारण बनूँ ,
गाऊँ तुम्हारे पवित्रता की झूठी स्तुतियाँ
या स्वच्छता का कोरा लिबास पहनाऊँ तुम्हें
या कह दूँ मैं सही - सही सारी बातें ।

मैं क्या करूँ माँ ,मैं क्या करूँ
असमंजस में हूँ ,
सही कहूँगा तो तुम्हारे भक्तों को ठेस पहुँचेगी
और गुण गाऊँ तो तुम्हारे साथ धोखा होगा
क्या करूँ माँ ,मैं क्या करूँ ।।

08/03/2017

विवाह (एक दृश्य)

आस्था का देव से अब हो रहा संगम यहाँ ।
सात फेरों से सजा है प्यार का बंधन यहाँ ।।

माह बाकी है अभी से हो रही तैयारियाँ,
सज रहें हैं घर सुहावन सज रही हैं क्यारियाँ
मित्र ,बन्धु संग साथी फोनकर - कर कह रहे
छोड़ दूँगा इस महोत्सव में भरी पिचकारियाँ
फिर तुम्हें उन सात रंगों में रंगूँगा इस कदर
भूल जाओगी सभी दुःख,और आओगी निखर

प्रेम की बातें मगर यह दे रही उलझन यहाँ ।।

बीतती है रात जग - जग ,बीतते हैं दिन सभी
अब नही कहता कोई कुछ काम कर लो तुम कभी
मिल रहा है स्नेह सबसे ,मिल रहा है प्यार भी
हो रहा है आजकल मेरा बहुत सत्कार भी
मैं अचम्भित हो रही हूँ बदलते व्यवहार से
ये बहन भी दूर होती जा रही इस यार से

देवतासम मानते सब कर रहे वन्दन यहाँ ।।

कर रही चहुँओर से अटखेलियाँ भाभी सभी
जा नही सकती अकेली ,रोंकते हैं सब अभी
चहलकदमी हो रही फिर वो अकेली कौन है
भर गया घर - द्वार रिस्तेदार से फिर मौन है
और मेरे गाँव की परिहास करती हैं सखी
बँध गयी ना हे प्रिये !जो खूब तुम बहती रही

लग रही हल्दी तुम्हें ,अब लग रहा चन्दन यहाँ ।।

यूँ अकेली बैठकर है देखती निज रूप को
और दर्पण में खिलाई सर्दियों में धूप को
हाँथ मेंहदी से सजे हैं ,हैं महावर पैर में
खो गई है स्वप्न - सुन्दर से सुहाने सैर में
फिर झिझकती है युँ ही जैसे कि दरवाजा खुला
दी चलो नीचे रही हैं माँ तुम्हें कब से बुला

सज रही है ,संवरती है ,लग रहा उबटन यहाँ ।।

और अब समधी सहित बारात आई द्वार पर
फट रहे गोले चमत्कृत हो रहा आकाश - घर
देखती सखियाँ सभी हैं इस परम - त्यौहार को
देखती हैं संग ही अपने सखी के प्यार को
गूँजता वातावरण है दिव्य मंत्रोच्चार से
हैं पधारे आज चतुरानन मेरे उद्गार से

आज दूल्हा खुश हुआ ,मुस्का रही दुल्हन यहाँ ।।

एक दूजे के गले में डालने माला लगे
तालियों की गड़गड़ाहट पुष्प बरसाने लगे
और अब विवाह की वह पुण्य वेला आ गई
हो गया विवाह ,अब वादे निभाने है चली
कर चुकी अर्पण ,समर्पण भाव - मन सब रीतियाँ
मिल रही है प्रेम से उद्गार करती प्रीतियाँ

काल - वेला बढ़ रही ज्यों बढ़ रही धड़कन यहाँ ।।

चँहचहाती ,कूकती थी जो कभी आँगन तले
सोचती है ,पोछती आँसू लिपटती है गले
माँ,बहन,भाई,पिता सब रो रहे हैं इस कदर
नयन से आँसू नही ,गिरता समुन्दर फूट कर
साथ है अब छूटता आई विदाई की घड़ी
रो रहे हैं वृक्ष - वन सब, यह प्रकृति भी रो पड़ी

नील (आज) करते देवगण भी अतिथि अभिनन्दन यहाँ ।।

आस्था का देव से अब हो रहा संगम यहाँ ।
सात फेरों से सजा है प्यार का बन्धन यहाँ ।।


यह कविता मैं अपने दो दोस्तों को समर्पित करता हूँ -------
दीक्षा मिश्रा (बचपन की दोस्त) और पूजा त्रिपाठी ( बुआ जी )
 मेरी तरफ से आप दोनों को आपके विवाहोत्सव की ढ़ेर सारी
शुभकामनाएँ,बधाइयाँ ।।

19/01/2017

तुम्हारी यादें

       1.
कल मुझे पढ़ोगी ,
रोओगी
भभकार मार -मार
जब मेरी कविताएँ
तुम्हारे हृदय को
उद्वेलित करेंगी ।

तुम्हें सम्बोधित करेंगी
बिन बनावटी - कविताएँ
मेरे प्रेम को
मुझे तुम्हारे सामने रख देंगी ।

मेरा स्वरूप तुम्हारी
आँखों के चारो तरफ
नाचेगा ,
और मैं तुम्हें
देखता रहूँगा
तब तक
कि जब तक
मेरी आँखें
अपने अन्तिम - क्षण तक
पलकें
बन्द न कर लें ।।
        2.
तुम्हारी यादें हैं
कि,
भीतर ही भीतर
पिराती हैं
जो अनिर्वचनीय
अकथनीय हैं ।
तुम्हारी यादों से
बनी कविताएँ
मुझे तुमसे मिलाती हैं ।।

तुम्हारी यादें ,
जो मुझे कविता करना सिखाती हैं,
स्थान देती हैं
उन लोगों के बीच बोलने का
साहस देती हैं
जो हमारे समय के बेहतरीन
कवियों में गिने जाते हैं ।।

तुम्हारी यादें,
जो बिन कुछ दिये
बिन कुछ कहे
अपना सर्वस्व - न्यौछावर
कर देती हैं
मुझे एक सच्चा - इंसान
बनाने में ।।

तुम्हारी यादें,
जो मुझे कर्तव्य - बोध
सिखाती हैं
उचितानुचित का ज्ञान
कराती रहती हैं समय - समय पर ।
तुम्हारे आदर्शों की
एक पोटली मिली है मुझे
जिसमें मैं बेहद - चाव से जीता हूँ ।।
          3.
तुम्हारी यादें,
जो माता - पिता में
ईश्वर का भान
कराती हैं
दिखाती हैं
उनके चरणों में
चारो धाम
श्रद्धा प्रकट
करती हैं बुजुर्गों के प्रति
आस्था उत्पन्न
करती हैं
उनके प्रति
जो समाज में
आस्था के पात्र हैं ।

तुम्हारी यादें,
जो रिस्तों की
बागडोर सम्भालने
में मददगार
साबित होती हैं
बड़े - चाव से
गूँथती हैं
मुझको माले में
और भी सुगन्धित - सुवासित
होने के लिए ।।
           4.
तुम्हारी यादें ,
जो सामाजिक बनाती हैं
मुझे,
ले जाकर खड़ा कर देती हैं
समाज के भीतर ।
सम्बल बनती हैं
कुरीतियों से लड़ने में
विरोध करने में
उन हर एक चीज़ों के
खिलाफ़,
जो गलत हैं ।

तुम्हारी यादें ,
जो सिर्फ़ प्यार ही नही
बगावत करना भी
सिखाती हैं ।
क्रांतिकारी
बनाती हैं
सिखाती हैं लड़ना
संघर्ष करना
तोड़ती हैं मेरे भीतर
के कायर को ।।

तुम्हारी यादें,
ना कि सिर्फ़ यादें हैं
तुम हो
जो हर कठिनाइयों में
साथ रहती हो मेरे
करती हो दृष्टि - विकसित
दूर - दराज़ की चीज़ों
को देखने में होता हूँ
समर्थ मैं ।।
           5.
और सच तो ये
कि ,
तुम्हारी यादें,
मुझे शून्य में
ले जाती हैं
इस समूचे कायनात में ।
मुझे जीना सिखाती हैं
अकेले
बिलकुल अकेले
कि जहाँ
मैं हूँ
तुम हो और
हैं तुम्हारी यादें  ।

तुम्हारी यादें,
आज कविता हैं
कल कहानी होंगी
परसों उपन्यास हो
सकती हैं ।
जो मुझे ले जाकर
खड़ा करेंगी ,
नदी उस पार
जहाँ मुझे देख
तुम खिल - खिलाकर
हँसोगी और मैं
मुस्कुराऊँगा
तुम्हें देख - देख ।।

Neelendra Shukla " Neel "

1.
Your heart will wrench
And you will cry inconsolably
When you will read my poems tomorrow.

My genuine poems
Will address you
And will bring forward my love and me to you.

I will dance as image
Around your eyes
And I will see you till last moment
Until my eyelids get closed.

2.
Your memories cause pain inside me
And it's inexplicable
Your memories result into poems
By which I meet you.

It's your memories
Which make me to compose poems
Gives me courage
To recite them
amoung the finest poets of our time.

It's your memories
Who without any word or deed,
Shower everything on me
To make me a noble human being.

Your memories make me to learn my duties
Taught me the righteous things, time to time
I got a bale full of your ideals,
In which I live very fondly.

3.
Your memories
Make me to feel
God in parents
Make me to see four abodes in their feet,
Your memories produce
Sense of reverence in me for aged peoples
And belief in those
Who are well believed in society.

Your memories
Help me to handle relationships
They entwine me very fondly in garland
So that I can be more fragrance full.

4.
Your memories make me social
Put me into society
Become my base to fight against abuses
Oppose against every things which are wrongful.

Your memories
Not only teach me love
But also to revolt
Make me revolutionary
Teach me to struggle
Slay coward inside me.


Your memories are not merely memories..
It's you, always with me
In every difficulty.
Make me wise, far sighted
By evolving my innerself.

5.
And the fact is that
Your memories take me to the start,
Make me to live in whole universes alone
Absolutely alone
Where no one is there but you and me
And your memories.

Your memories are poem today
Tomorrow would be stories
And day after tomorrow might be novels,
Those will take me to the other side of the river
Where you will laugh your heart out
And I will smile by looking at you.

TRANSLATED BY PRIYESH SHUKLA 

17/01/2017

आज से है जंग मेरी इस नियति के बाप से

फूटती चिंगारियाँ हैं जिस्म के किस ताप से
ये पसीना नम किया है या हुआ है भाप से
आज ये धधकी हुई आँखें चिता सी जल रही
जख़्म के इस दर्द से या रक्त हैं संताप से

बादलों से भाव घिरते छोड़ते हैं द्वारे - मन
कशमकश में हैं पड़े पापी हुए किस पाप से

पीठ की रंगत फ़कत है लालिमा ओढ़े हुए
हाँथ को भी कर रहा है वो गठीला आप से

देखना भी बन्द कर देंगें स्वयं परछाइयाँ
खत्म होता जा रहा जीवन नियति के शाप से

आज सारे धर्म का बस चाहता हूँ इल्म मैं
कौन ऐसा मंत्र बोलूँ मुक्त कर दूँ जाप से

है अभी क्या उम्र आखिर बेड़ियों में कश रहे
रोशनी थोड़ा जलाओ डर रहे हैं रात से

यूँ नही तुम माथ टेको यूँ नही पैरों गिरो
तुच्छ प्राणी हैं सभी कब सीखते हैं बात से

और यदि मासूमियत का ये भला - परिणाम है
आज से है जंग मेरी इस नियति के बाप से ।।

05/01/2017

गीत (ओ री सखि )

ओ री सखि तोसे नैना लड़े निसदिन ।
काटूँ दिन रात अपने घड़ी गिन - गिन ।।

ज्ञान ,विज्ञान तू तू ही धन सम्पदा
साथ तेरा रहे जो ,कहाँ विपदा
मेरा ज्ञान बढ़ाओ निज शरण में लाओ
दु:ख दूर करो खुशियाँ बरसाओ ।

ज्ञान तुम बरसाओ रिमझिम - रिमझिम ।।

जैसा भी हो चरम इक तू सच सब भरम
संग साथ चलूँ तेरे जन्मों - जनम
तोसे लागी लगन भूला सब हूँ मगन
एकचित हो तुम्हें याद करता ये मन ।

तेरी दूरी सताए हर पल - हर छिन ।।

जाऊँ मैं बलिहारी तेरे रूप पे वारि
पुष्प अर्पित करूँ बन मैं फुलवारी
तेरे सपने सजाऊँ ,तुम्हें अपना बनाऊँ
नित संग रहूँ तोसे प्रीति बढ़ाऊँ ।

मैं अधूरा हूँ ,हे कृष्ण !इक तेरे बिन ।।

04/01/2017

" गये बचपन से उनको आज देखे "

चलो अब हुश्न का महताब देखें
अधूरे ही सही पर ख्वाब देखें

बड़ी कमसिन अदाएँ वो दिखाई
मेरा निखरा हुआ अन्दाज़ देखें

गये दिन बीत उस आवारगी के
मनाएँ जश्न इक आगाज़ देखें

अभी जिंदादिली है खूब उनमें
मुकद्दर जोड़कर एहसास देखें

बड़ी ही खूबसूरत सी गज़ल हैं
सजा लूँ लब पे फिर आवाज देखें

जरा सा हाँथ पकड़े चल पड़े बस
संवरते भाव के अल्फाज़ देखें

फ़तह फर्माइसों की कर लिए हैं
समूचेपन का ये विश्वास देखें

मुकर्रर जिन्दगी आखिर कहाँ है
भरे मन से उन्हें हम आज़ देखे

यहाँ अट्टालिका पे साथ हैं हम
हमारे प्यार को आकाश देखे

कई दिन, दोपहर हैं साल बीते
गये बचपन से उनको आज देखे 

03/01/2017

यह धरा पूरी तुम्हारी इस धरा को जीत लो

है यहाँ रहना तुम्हें तो गीत गाना सीख लो
ढाई आखर शब्द बोलो मुस्कुराना सीख लो

मैं नही कहता कि तुम परतंत्र हो निष्पन्द हो
किस कदर चलना तुम्हें जम्हूरियत से सीख लो

वो यहाँ जिस राह भेजें शान्त हो यूँ चल पड़ो
हाँथ में लेलो कटोरा और उनसे भीख लो

चल रहे हँथियार हों तो कष्ट तुम सहते रहो
जिन्दगी भर जख़्म खाओ दर्द हो जब चीख लो

चमड़ियाँ पहले भी उधड़ी आज भी आलम वही
थूँकने की चाह जब हो हाँथ में ही पीक लो

ख़त्म कर दे रूढ़ियाँ सब इस भरे संसार से
बुद्धि का कौशल दिखाओ साथ सारे मीत लो

और अब इंसानियत की है कहाँ कद्र-ए-हुज़ूर
बेड़ियाँ सब त्यागकर अब सर उठाना सीख लो

यह प्रकृति,यह भोग,वैभव शान्त यह वातावरण
यह धरा पूरी तुम्हारी इस धरा को जीत लो 

02/01/2017

राजसिंहासन पे अब मजदूर होने चाहिए

जिन्दगी के जख़्म सारे दूर होने चाहिए
जो इरादे नेक हों मंज़ूर होने चाहिए

राजधानी देश की रखे रहो दिल्ली मगर,
राजसिंहासन पे अब मजदूर होने चाहिए

कब तलक आखिर रखेंगें इस कदर इज्ज़ो -नियाज़
जुल्मियत की त्याग पे मज़कूर होने चाहिए

राष्ट्र यह उन्नति करे , हो राष्ट्र जन्नत की तरह
इस सियासत में सभी अब शूर होने चाहिए 

01/01/2017

गुब्बारे वाली बच्चियाँ

गुब्बारे वाली बच्चियाँ,
रोज़ दीखती हैं।
दिन - रात
विश्वविद्यालय के बाहर
लंका चौराहे पर ,
अपने भविष्य का निर्माण करती हुई ।

रोज़ दीखते हैं
उनके पवित्र हाँथों में गुब्बारे,
जो शायद अपना अस्तित्व स्थापित कर चुके हैं
उनके पवित्र हाँथों में ।
जिनमें अभी भी कई सम्भावनाएँ बची हुई हैं ।

रोज़ दीखते हैं बच्चे कचरा
बीनने वाले,
हर रोज़ हाँथ - फैलाते हुए बच्चे
दीख जाते हैं सड़कों पर
दीखते हैं होटल ,रेस्ट्राँ में
काम करते हुए बच्चे
उसी विश्वविद्यालय के बाहर जहाँ
लगभग 50 हजार
विद्यार्थियों का भविष्य रचा जा रहा है
रचे जा रहे हैं ,
डाक्टर ,मास्टर ,इंजीनियर
रचे जा रहे हैं ,
गायक ,वादक ,नर्तक
रचे जा रहे हैं कवि ,रचे जा रहे हैं
आलोचक,
रची जा रही हैं ढेरो सारी कलाएँ
संस्कृति और सभ्यताएँ
रची जा रही है पूरी की पूरी एक पीढ़ी भावी भविष्य की ।

उन हाँथों को अभी भी ,
पकड़ाया जा सकता है
काॅपी कलम और पुस्तकें ,
पकड़ाई जा सकती है एक राह
जो उनकी सुनहली मन्जिल तक जाए ।

बचे हुए हैं दिन ,महीने ,साल
बची है उनकी पूरी जिन्दगी
बचे होंगे सपने
जो वो हर रोज़ देखती होंगी ,
किसी बच्चे को बैग टाँगे देख
बचा होगा एक सुनहला भविष्य
जिसका निर्माण होना अभी बाकी है
अभी बाकी है रात की काली स्याह चादर का हटना ,
एक सुनहली सुबह के लिए ।

मालवीय जी ,
हर दिन - हर रात ,
रक्त होते होंगे लज्जा से
इन बच्चियों के हाँथों में गुब्बारे देखकर ।
शर्मिन्दगी से हर रोज़ अपना चेहरा
छुपाते होंगे ,
इन बच्चों के सामने ।।

नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ इन बच्चों के साथ आप सभी को ।।


गज़ल

एक निर्णय ले लिए फिर क्या फ़रक पड़ता खुदा या तो जन्नत राह होगी या तो दोजख का सफर जिन्दगी को आग की दरिया पे है रखना मुझे या तो मेरी ...