19/08/2017

जन्मदिन

जन्मदिन के इस सुअवसर पे तुम्हें अर्पण करूँ क्या
देख लो मेरे हृदय को भावना दर्पण करूँ क्या

पूँछता हूँ मैं अकिंचन आज अपने यार से
बाँट दूँ यह विश्व सारा या समेटूँ प्यार से
शब्द हैं, कुछ अर्थ हैं, कुछ भावनाओं के कुसुम
ला बिछाऊँ आज मैं पैरों तले गुलजार से
बौर की देखो छटा है माह ये ऋतुराज का
दिव्य - मेधा हो प्रभा आलोक हो गणराज का
जिन्दगी सारी खुशी दे जो तुम्हें मंजूर हो
और सारे कष्ट जो भी हैं या हों वो दूर हों
राष्ट्र में हो कीर्ति तेरी राष्ट्र यह वंदन करे
राष्ट्र पे हो तू निछावर राष्ट्र अभिनन्दन करे ।

भावना की बूँद हैं इससे अधिक वर्षण करूँ क्या ।।


19/07/2017

मुहब्बत के वास्ते

दुनिया तू घूमता रहा शोहरत के वास्ते
दो - चार गज़ल बोल मुहब्बत के वास्ते

पर्वत,पठार,पेड़ ,नदी और झरोखे ,
भारत बचाए रख तू इबादत के वास्ते

हो प्रेम बेहिसाब एक - दूजे मुल्क से
इंसान बन जरा तू शराफत के वास्ते

इस देश की रक्षा में अगर प्राण भी जाँए
मिट जाऊँ सर कलम हो शहादत के वास्ते


16/06/2017

तुम्हारे चेहरे पर


                            रूपों का विस्तार तुम्हारे चेहरे पर
                            दिखता माँ सा प्यार तुम्हारे चेहरे पर
                            कैसे खुद को रोक सकूँ ,मेरी दुनिया
                            लुट जाए सौ बार तुम्हारे चेहरे पर

                            छोटी बिंदिया माथे पर ऐसे सोहे
                            हों सोलह श्रृंगार तुम्हारे चेहरे पर

                           जब से होंठों ने होंठों को पाया है
                           तब से है त्यौहार तुम्हारे चेहरे पर

                           वर्णन करने में ये छह की छह ऋतुएँ
                           कम पड़ती सरकार तुम्हारे चेहरे पर

                           कान्हा बनकर घूँमूँ तेरी यादों में
                           दिखी राधिका चार तुम्हारे चेहरे पर

                           तेरी गोदी में माँ के आँचल का सुख
                           दिखता प्रेम अपार तुम्हारे चेहरे पर

                           जी करता है जन्मदिवस के अवसर पर
                           लिख दूँ सारा प्यार तुम्हारे चेहरे पर ।।


अपने जन्मदिन (19 जून) के अवसर पर तुम्हारे लिए
एक छोटी सी रचना इस उद्देश्य से कि मेरी
काल्पनिक दुनिया में हमेशा तुम इसी
तरह अपनी यादों के साथ मुझे सजाती रहना
इससे भी गम्भीर विचार देना,अपनी यादों से
लबरेज़ रखना कि हमेशा तरोताज़ा रहूँ मैं
तुम्हारी यादें ही तो हैं जो मुझे ताकत देती हैं
किसी भी कार्य को बेहद सलीके से करने में
तुम्हारा प्यार आकाश की तरह है जो मुझे
ढक रखा है ,तुम्हारी यादें सागर की लहरों की तरह हैं
जो मेरे हृदय को और झकझोरती हैं तरड़्गित करती हैं ।।

30/04/2017

बना सकती हो क्या

मुझको अपना मेहमान बना सकती हो क्या ?
मुझसे थोड़ी पहचान बना सकती हो क्या ?

जिसको भगवान बनाओ उसको पूजो पर
मुझको भोला इन्सान बना सकती हो क्या ?

मैं मन्दिर ,मस्जिद गिरिजाघर को क्यों जाऊँ
खुद को मेरा भगवान बना सकती हो क्या ?

मैं गिनता हूँ उन्मुक्त गगन में तारों को
खुद को तुम मेरा चाँद बना सकती हो क्या ?

छोड़ो सारा संसार गजब की दुनिया है
होंठों से छूकर जान बना सकती हो क्या ?

यूँ मत खोजो दुनिया में अंधे लोगों को
मुझको देखो पति-प्राण बना सकती हो क्या ?

26/04/2017

बहुत हैं

अल्लाह तेरी नज़र में बेशुमार बहुत हैं
ईश्वर नही दिखे कहीं दरबार बहुत हैं ।
इक मैं ही नही प्यार करके पाप किया हूँ ,
धरती पे मेरे जैसे गुनाहगार बहुत हैं

नज़रें जमाए देखती है हुश्न - मुहब्बत
मुझ जैसे उस नज़र में गिरफ्तार बहुत हैं

इस देश की हमदर्द निगाहों से मदद लो
सब नीच ही नही हैं मददगार बहुत हैं

गाँवों की दशा देख शहर ही भला लगे
घर कम ही देखता हूँ मैं दीवार बहुत हैं

माँ की दुवाएँ साथ हैं, बहनों की इबादत
गुस्से भरे पिता हैं मगर प्यार बहुत है

दाढ़ी,जटाएँ देख के भरम में मत पड़ो
पाखण्डियों के नाम बलात्कार बहुत हैं

बहनों की , बेटियों की यूँ इज्जत से न खेलो
शहरों में हवस के लिए बाज़ार बहुत हैं

गैरों का खाके कब तलक आराम करोगे
बाँटो तो सही ,देश में हकदार बहुत हैं

इसका कभी उसका हूँ सदा रोल निभाया
चेहरा है एक दोस्तों किरदार बहुत हैं

दिल से मिला हूँ सबसे नही बुद्धि लगाई
वो सोंचते हैं खुद को समझदार बहुत हैं

हर पाँच - वर्ष बाद दिखें हाँथ जोड़कर
भारत में दिखी नक्कटी सरकार बहुत हैं

दूजे के काँध रख के मियाँ ट्रिगर दबाएँ
इक " नील " तू ही मूर्ख होशियार बहुत हैं ।।

16/04/2017

न जाने कल कहाँ ये दोस्त तेरी दीक्षा हो

प्रिय बचपन की दोस्त दीक्षा मिश्रा जी के लिए उनके विशेष
आग्रह पर उनको समर्पित  -------

महकती हो सदा फूलों सी वो ऐसी फिज़ा हो
खुले हों जुल्फ लहराती हुई कोई निशाँ हो ,
चमकती,चमचमाती धूप हो जैसे शरद की
सुनहरी शान्त सी कोमल हमारी दीक्षा हो ।।

नही चन्दा ,नही सूरज ,नही गुलनार माँगू
सदा खुशियों भरी, पावन पवन वो,दीक्षा हो ।।

अधूरी एक भी किरणें नही टकराएँ उससे,
कि छनकर जाएँ जिसपे रोशनी वो दीक्षा हो ।।

सभी हों राह ऐसी आज जिसपे पैर तेरा
पड़ें ,बिछ जाएँ सारे फूल जिसपे दीक्षा हो ।।

मिटें नापाक वो सारी सभी की भावनाएँ
कि जिसकी सोंच पे बैठी हुई ये दीक्षा हो ।।

बड़ी हसरत,बड़ी चाहत,बड़ा महफूज़ हूँ मैं
जिसे महफूज़ तुम रखना हमारी दीक्षा हो ।।

बहुत शीतल हिलोरें मारती हैं भावनाएँ
कि हो गरमी में जो बदरी सदृश वो,दीक्षा हो ।।

चलो अब नील तुम भी साथ चल लो ,
न जाने कल कहाँ ये दोस्त तेरी दीक्षा हो ।।

14/04/2017

कोशिश करता हूँ

लिखने और मिटाने की मैं कोशिश करता हूँ ,
अक्सर तुझको पाने की मैं कोशिश करता हूँ

सूरज,चन्दा,फूल,खिलौने डालूँ तेरी झोली में
तुझमें खुद मैं घुल जाने की कोशिश करता हूँ

माँ के चरणों की गाथाएँ बाबू जी का प्यार
सुबह-सवेरे दोहराने की कोशिश करता हूँ

बहनें हों उन्मुक्त हमारी जितना चाहें पढ़ पाएँ,
बाबू जी को समझाने की कोशिश करता हूँ

चाचा चाची,मामा मामी,भाई भौजी सब
सारे रिस्तों को पाने की कोशिश करता हूँ

शहरों में वो बात कहाँ जो गाँवों की अमराई में
फिर अपने घर को जाने की कोशिश करता हूँ

जन्नत - स्वर्ग की बातें अद्भुत कौन देख पाया अब तक
इक दूजे को सुलझाने की कोशिश करता हूँ

जिनसे आँखें डरती आई जीवन के हर मंज़र पे ,
उनसे आँख मिलाने की मैं कोशिश करता हूँ ।।

जब - जब अपना रूप बिगाड़ी तानाशाही सरकारें,
तब - तब मैं खुद टकराने की कोशिश करता हूँ ।।

30/03/2017

हाशिए पर गंगा

माँ,
मैं देख रहा हूँ
तुम्हारी पीड़ा,तुम्हारे कष्ट

मैं देख रहा हूँ ,
कि कैसे तुम्हारे हृदय पे करती हैं चोट ,
मथ देती हैं तुम्हारे पेट को
झकझोर देती हैं पूरी की पूरी शरीर
ये आधुनिक नावें,
काला कर चुकी हैं समूचे जल को अपने धुआँ से ।

मैं देख रहा हूँ ,
कि कैसे तुम्हारे नाम पे खेली जा रही है
ओछी - राजनीति ,
खर्च किए जा रहे हैं हजारों करोड़ रूपये
पवित्रता ,स्वच्छता और निर्मल बनाने का नाम दे - देकर ।

क्या किसी ने कभी अपनी माँ से राजनीति खेली है क्या ?

मैं देख रहा हूँ कि लगातार
तुम धंसती जा रही हो राजनीतिक - दलदल में
जहाँ लोग तुम्हारा सहारा नही बन रहे हैं
अपितु दिखा रहे हैं तुम्हें हाँथ
औपचारिकता पूरी करने के लिए
तुम्हारे नाम पर गद्दी पे बने रहने के लिए ।

माँ,
मैं देख रहा हूँ ,
कि कैसे दोहन हो रहा है तुम्हारा
इस ग्लोब्लाइजेशन के दौर में ।
लगातार तुम्हारी कोख में फेंका जा रहा है
कचरा ,तैर रहा है मैला
और तो और मुर्दे भी तैरते दिख जाते हैं कभी - कभी ।

शहर के कल - कारखाने ,फैक्ट्रियाँ
और असंख्य गंदी नालियाँ तुमसे आके मिलती हैं
प्रदूषित करती हैं तुम्हें ,
और तुम बड़ी ही सहजता से स्वीकारती हो उन्हें,
सहती हो ।

टूट गई हैं तुम्हारी लहरें
समाप्त होता जा रहा है तुम्हारा जल
अब मैं तुम्हें बूढ़ी कहूँ या बीमार
कुछ सूझता नही है ।

अब तुम ही कहो
मैं तुम्हारा चारण बनूँ ,
गाऊँ तुम्हारे पवित्रता की झूठी स्तुतियाँ
या स्वच्छता का कोरा लिबास पहनाऊँ तुम्हें
या कह दूँ मैं सही - सही सारी बातें ।

मैं क्या करूँ माँ ,मैं क्या करूँ
असमंजस में हूँ ,
सही कहूँगा तो तुम्हारे भक्तों को ठेस पहुँचेगी
और गुण गाऊँ तो तुम्हारे साथ धोखा होगा
क्या करूँ माँ ,मैं क्या करूँ ।।

08/03/2017

विवाह (एक दृश्य)

आस्था का देव से अब हो रहा संगम यहाँ ।
सात फेरों से सजा है प्यार का बंधन यहाँ ।।

माह बाकी है अभी से हो रही तैयारियाँ,
सज रहें हैं घर सुहावन सज रही हैं क्यारियाँ
मित्र ,बन्धु संग साथी फोनकर - कर कह रहे
छोड़ दूँगा इस महोत्सव में भरी पिचकारियाँ
फिर तुम्हें उन सात रंगों में रंगूँगा इस कदर
भूल जाओगी सभी दुःख,और आओगी निखर

प्रेम की बातें मगर यह दे रही उलझन यहाँ ।।

बीतती है रात जग - जग ,बीतते हैं दिन सभी
अब नही कहता कोई कुछ काम कर लो तुम कभी
मिल रहा है स्नेह सबसे ,मिल रहा है प्यार भी
हो रहा है आजकल मेरा बहुत सत्कार भी
मैं अचम्भित हो रही हूँ बदलते व्यवहार से
ये बहन भी दूर होती जा रही इस यार से

देवतासम मानते सब कर रहे वन्दन यहाँ ।।

कर रही चहुँओर से अटखेलियाँ भाभी सभी
जा नही सकती अकेली ,रोंकते हैं सब अभी
चहलकदमी हो रही फिर वो अकेली कौन है
भर गया घर - द्वार रिस्तेदार से फिर मौन है
और मेरे गाँव की परिहास करती हैं सखी
बँध गयी ना हे प्रिये !जो खूब तुम बहती रही

लग रही हल्दी तुम्हें ,अब लग रहा चन्दन यहाँ ।।

यूँ अकेली बैठकर है देखती निज रूप को
और दर्पण में खिलाई सर्दियों में धूप को
हाँथ मेंहदी से सजे हैं ,हैं महावर पैर में
खो गई है स्वप्न - सुन्दर से सुहाने सैर में
फिर झिझकती है युँ ही जैसे कि दरवाजा खुला
दी चलो नीचे रही हैं माँ तुम्हें कब से बुला

सज रही है ,संवरती है ,लग रहा उबटन यहाँ ।।

और अब समधी सहित बारात आई द्वार पर
फट रहे गोले चमत्कृत हो रहा आकाश - घर
देखती सखियाँ सभी हैं इस परम - त्यौहार को
देखती हैं संग ही अपने सखी के प्यार को
गूँजता वातावरण है दिव्य मंत्रोच्चार से
हैं पधारे आज चतुरानन मेरे उद्गार से

आज दूल्हा खुश हुआ ,मुस्का रही दुल्हन यहाँ ।।

एक दूजे के गले में डालने माला लगे
तालियों की गड़गड़ाहट पुष्प बरसाने लगे
और अब विवाह की वह पुण्य वेला आ गई
हो गया विवाह ,अब वादे निभाने है चली
कर चुकी अर्पण ,समर्पण भाव - मन सब रीतियाँ
मिल रही है प्रेम से उद्गार करती प्रीतियाँ

काल - वेला बढ़ रही ज्यों बढ़ रही धड़कन यहाँ ।।

चँहचहाती ,कूकती थी जो कभी आँगन तले
सोचती है ,पोछती आँसू लिपटती है गले
माँ,बहन,भाई,पिता सब रो रहे हैं इस कदर
नयन से आँसू नही ,गिरता समुन्दर फूट कर
साथ है अब छूटता आई विदाई की घड़ी
रो रहे हैं वृक्ष - वन सब, यह प्रकृति भी रो पड़ी

नील (आज) करते देवगण भी अतिथि अभिनन्दन यहाँ ।।

आस्था का देव से अब हो रहा संगम यहाँ ।
सात फेरों से सजा है प्यार का बन्धन यहाँ ।।


यह कविता मैं अपने दो दोस्तों को समर्पित करता हूँ -------
दीक्षा मिश्रा (बचपन की दोस्त) और पूजा त्रिपाठी ( बुआ जी )
 मेरी तरफ से आप दोनों को आपके विवाहोत्सव की ढ़ेर सारी
शुभकामनाएँ,बधाइयाँ ।।

19/01/2017

तुम्हारी यादें

       1.
कल मुझे पढ़ोगी ,
रोओगी
भभकार मार -मार
जब मेरी कविताएँ
तुम्हारे हृदय को
उद्वेलित करेंगी ।

तुम्हें सम्बोधित करेंगी
बिन बनावटी - कविताएँ
मेरे प्रेम को
मुझे तुम्हारे सामने रख देंगी ।

मेरा स्वरूप तुम्हारी
आँखों के चारो तरफ
नाचेगा ,
और मैं तुम्हें
देखता रहूँगा
तब तक
कि जब तक
मेरी आँखें
अपने अन्तिम - क्षण तक
पलकें
बन्द न कर लें ।।
        2.
तुम्हारी यादें हैं
कि,
भीतर ही भीतर
पिराती हैं
जो अनिर्वचनीय
अकथनीय हैं ।
तुम्हारी यादों से
बनी कविताएँ
मुझे तुमसे मिलाती हैं ।।

तुम्हारी यादें ,
जो मुझे कविता करना सिखाती हैं,
स्थान देती हैं
उन लोगों के बीच बोलने का
साहस देती हैं
जो हमारे समय के बेहतरीन
कवियों में गिने जाते हैं ।।

तुम्हारी यादें,
जो बिन कुछ दिये
बिन कुछ कहे
अपना सर्वस्व - न्यौछावर
कर देती हैं
मुझे एक सच्चा - इंसान
बनाने में ।।

तुम्हारी यादें,
जो मुझे कर्तव्य - बोध
सिखाती हैं
उचितानुचित का ज्ञान
कराती रहती हैं समय - समय पर ।
तुम्हारे आदर्शों की
एक पोटली मिली है मुझे
जिसमें मैं बेहद - चाव से जीता हूँ ।।
          3.
तुम्हारी यादें,
जो माता - पिता में
ईश्वर का भान
कराती हैं
दिखाती हैं
उनके चरणों में
चारो धाम
श्रद्धा प्रकट
करती हैं बुजुर्गों के प्रति
आस्था उत्पन्न
करती हैं
उनके प्रति
जो समाज में
आस्था के पात्र हैं ।

तुम्हारी यादें,
जो रिस्तों की
बागडोर सम्भालने
में मददगार
साबित होती हैं
बड़े - चाव से
गूँथती हैं
मुझको माले में
और भी सुगन्धित - सुवासित
होने के लिए ।।
           4.
तुम्हारी यादें ,
जो सामाजिक बनाती हैं
मुझे,
ले जाकर खड़ा कर देती हैं
समाज के भीतर ।
सम्बल बनती हैं
कुरीतियों से लड़ने में
विरोध करने में
उन हर एक चीज़ों के
खिलाफ़,
जो गलत हैं ।

तुम्हारी यादें ,
जो सिर्फ़ प्यार ही नही
बगावत करना भी
सिखाती हैं ।
क्रांतिकारी
बनाती हैं
सिखाती हैं लड़ना
संघर्ष करना
तोड़ती हैं मेरे भीतर
के कायर को ।।

तुम्हारी यादें,
ना कि सिर्फ़ यादें हैं
तुम हो
जो हर कठिनाइयों में
साथ रहती हो मेरे
करती हो दृष्टि - विकसित
दूर - दराज़ की चीज़ों
को देखने में होता हूँ
समर्थ मैं ।।
           5.
और सच तो ये
कि ,
तुम्हारी यादें,
मुझे शून्य में
ले जाती हैं
इस समूचे कायनात में ।
मुझे जीना सिखाती हैं
अकेले
बिलकुल अकेले
कि जहाँ
मैं हूँ
तुम हो और
हैं तुम्हारी यादें  ।

तुम्हारी यादें,
आज कविता हैं
कल कहानी होंगी
परसों उपन्यास हो
सकती हैं ।
जो मुझे ले जाकर
खड़ा करेंगी ,
नदी उस पार
जहाँ मुझे देख
तुम खिल - खिलाकर
हँसोगी और मैं
मुस्कुराऊँगा
तुम्हें देख - देख ।।

17/01/2017

आज से है जंग मेरी इस नियति के बाप से

फूटती चिंगारियाँ हैं जिस्म के किस ताप से
ये पसीना नम किया है या हुआ है भाप से
आज ये धधकी हुई आँखें चिता सी जल रही
जख़्म के इस दर्द से या रक्त हैं संताप से

बादलों से भाव घिरते छोड़ते हैं द्वारे - मन
कशमकश में हैं पड़े पापी हुए किस पाप से

पीठ की रंगत फ़कत है लालिमा ओढ़े हुए
हाँथ को भी कर रहा है वो गठीला आप से

देखना भी बन्द कर देंगें स्वयं परछाइयाँ
खत्म होता जा रहा जीवन नियति के शाप से

आज सारे धर्म का बस चाहता हूँ इल्म मैं
कौन ऐसा मंत्र बोलूँ मुक्त कर दूँ जाप से

है अभी क्या उम्र आखिर बेड़ियों में कश रहे
रोशनी थोड़ा जलाओ डर रहे हैं रात से

यूँ नही तुम माथ टेको यूँ नही पैरों गिरो
तुच्छ प्राणी हैं सभी कब सीखते हैं बात से

और यदि मासूमियत का ये भला - परिणाम है
आज से है जंग मेरी इस नियति के बाप से ।।

05/01/2017

गीत (ओ री सखि )

ओ री सखि तोसे नैना लड़े निसदिन ।
काटूँ दिन रात अपने घड़ी गिन - गिन ।।

ज्ञान ,विज्ञान तू तू ही धन सम्पदा
साथ तेरा रहे जो ,कहाँ विपदा
मेरा ज्ञान बढ़ाओ निज शरण में लाओ
दु:ख दूर करो खुशियाँ बरसाओ ।

ज्ञान तुम बरसाओ रिमझिम - रिमझिम ।।

जैसा भी हो चरम इक तू सच सब भरम
संग साथ चलूँ तेरे जन्मों - जनम
तोसे लागी लगन भूला सब हूँ मगन
एकचित हो तुम्हें याद करता ये मन ।

तेरी दूरी सताए हर पल - हर छिन ।।

जाऊँ मैं बलिहारी तेरे रूप पे वारि
पुष्प अर्पित करूँ बन मैं फुलवारी
तेरे सपने सजाऊँ ,तुम्हें अपना बनाऊँ
नित संग रहूँ तोसे प्रीति बढ़ाऊँ ।

मैं अधूरा हूँ ,हे कृष्ण !इक तेरे बिन ।।

04/01/2017

" गये बचपन से उनको आज देखे "

चलो अब हुश्न का महताब देखें
अधूरे ही सही पर ख्वाब देखें

बड़ी कमसिन अदाएँ वो दिखाई
मेरा निखरा हुआ अन्दाज़ देखें

गये दिन बीत उस आवारगी के
मनाएँ जश्न इक आगाज़ देखें

अभी जिंदादिली है खूब उनमें
मुकद्दर जोड़कर एहसास देखें

बड़ी ही खूबसूरत सी गज़ल हैं
सजा लूँ लब पे फिर आवाज देखें

जरा सा हाँथ पकड़े चल पड़े बस
संवरते भाव के अल्फाज़ देखें

फ़तह फर्माइसों की कर लिए हैं
समूचेपन का ये विश्वास देखें

मुकर्रर जिन्दगी आखिर कहाँ है
भरे मन से उन्हें हम आज़ देखे

यहाँ अट्टालिका पे साथ हैं हम
हमारे प्यार को आकाश देखे

कई दिन, दोपहर हैं साल बीते
गये बचपन से उनको आज देखे 

03/01/2017

यह धरा पूरी तुम्हारी इस धरा को जीत लो

है यहाँ रहना तुम्हें तो गीत गाना सीख लो
ढाई आखर शब्द बोलो मुस्कुराना सीख लो

मैं नही कहता कि तुम परतंत्र हो निष्पन्द हो
किस कदर चलना तुम्हें जम्हूरियत से सीख लो

वो यहाँ जिस राह भेजें शान्त हो यूँ चल पड़ो
हाँथ में लेलो कटोरा और उनसे भीख लो

चल रहे हँथियार हों तो कष्ट तुम सहते रहो
जिन्दगी भर जख़्म खाओ दर्द हो जब चीख लो

चमड़ियाँ पहले भी उधड़ी आज भी आलम वही
थूँकने की चाह जब हो हाँथ में ही पीक लो

ख़त्म कर दे रूढ़ियाँ सब इस भरे संसार से
बुद्धि का कौशल दिखाओ साथ सारे मीत लो

और अब इंसानियत की है कहाँ कद्र-ए-हुज़ूर
बेड़ियाँ सब त्यागकर अब सर उठाना सीख लो

यह प्रकृति,यह भोग,वैभव शान्त यह वातावरण
यह धरा पूरी तुम्हारी इस धरा को जीत लो 

02/01/2017

राजसिंहासन पे अब मजदूर होने चाहिए

जिन्दगी के जख़्म सारे दूर होने चाहिए
जो इरादे नेक हों मंज़ूर होने चाहिए

राजधानी देश की रखे रहो दिल्ली मगर,
राजसिंहासन पे अब मजदूर होने चाहिए

कब तलक आखिर रखेंगें इस कदर इज्ज़ो -नियाज़
जुल्मियत की त्याग पे मज़कूर होने चाहिए

राष्ट्र यह उन्नति करे , हो राष्ट्र जन्नत की तरह
इस सियासत में सभी अब शूर होने चाहिए 

01/01/2017

गुब्बारे वाली बच्चियाँ

गुब्बारे वाली बच्चियाँ,
रोज़ दीखती हैं।
दिन - रात
विश्वविद्यालय के बाहर
लंका चौराहे पर ,
अपने भविष्य का निर्माण करती हुई ।

रोज़ दीखते हैं
उनके पवित्र हाँथों में गुब्बारे,
जो शायद अपना अस्तित्व स्थापित कर चुके हैं
उनके पवित्र हाँथों में ।
जिनमें अभी भी कई सम्भावनाएँ बची हुई हैं ।

रोज़ दीखते हैं बच्चे कचरा
बीनने वाले,
हर रोज़ हाँथ - फैलाते हुए बच्चे
दीख जाते हैं सड़कों पर
दीखते हैं होटल ,रेस्ट्राँ में
काम करते हुए बच्चे
उसी विश्वविद्यालय के बाहर जहाँ
लगभग 50 हजार
विद्यार्थियों का भविष्य रचा जा रहा है
रचे जा रहे हैं ,
डाक्टर ,मास्टर ,इंजीनियर
रचे जा रहे हैं ,
गायक ,वादक ,नर्तक
रचे जा रहे हैं कवि ,रचे जा रहे हैं
आलोचक,
रची जा रही हैं ढेरो सारी कलाएँ
संस्कृति और सभ्यताएँ
रची जा रही है पूरी की पूरी एक पीढ़ी भावी भविष्य की ।

उन हाँथों को अभी भी ,
पकड़ाया जा सकता है
काॅपी कलम और पुस्तकें ,
पकड़ाई जा सकती है एक राह
जो उनकी सुनहली मन्जिल तक जाए ।

बचे हुए हैं दिन ,महीने ,साल
बची है उनकी पूरी जिन्दगी
बचे होंगे सपने
जो वो हर रोज़ देखती होंगी ,
किसी बच्चे को बैग टाँगे देख
बचा होगा एक सुनहला भविष्य
जिसका निर्माण होना अभी बाकी है
अभी बाकी है रात की काली स्याह चादर का हटना ,
एक सुनहली सुबह के लिए ।

मालवीय जी ,
हर दिन - हर रात ,
रक्त होते होंगे लज्जा से
इन बच्चियों के हाँथों में गुब्बारे देखकर ।
शर्मिन्दगी से हर रोज़ अपना चेहरा
छुपाते होंगे ,
इन बच्चों के सामने ।।

नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ इन बच्चों के साथ आप सभी को ।।


जन्मदिन

जन्मदिन के इस सुअवसर पे तुम्हें अर्पण करूँ क्या देख लो मेरे हृदय को भावना दर्पण करूँ क्या पूँछता हूँ मैं अकिंचन आज अपने यार से बाँट दूँ...