05/01/2017

गीत (ओ री सखि )

ओ री सखि तोसे नैना लड़े निसदिन ।
काटूँ दिन रात अपने घड़ी गिन - गिन ।।

ज्ञान ,विज्ञान तू तू ही धन सम्पदा
साथ तेरा रहे जो ,कहाँ विपदा
मेरा ज्ञान बढ़ाओ निज शरण में लाओ
दु:ख दूर करो खुशियाँ बरसाओ ।

ज्ञान तुम बरसाओ रिमझिम - रिमझिम ।।

जैसा भी हो चरम इक तू सच सब भरम
संग साथ चलूँ तेरे जन्मों - जनम
तोसे लागी लगन भूला सब हूँ मगन
एकचित हो तुम्हें याद करता ये मन ।

तेरी दूरी सताए हर पल - हर छिन ।।

जाऊँ मैं बलिहारी तेरे रूप पे वारि
पुष्प अर्पित करूँ बन मैं फुलवारी
तेरे सपने सजाऊँ ,तुम्हें अपना बनाऊँ
नित संग रहूँ तोसे प्रीति बढ़ाऊँ ।

मैं अधूरा हूँ ,हे कृष्ण !इक तेरे बिन ।।

04/01/2017

" गये बचपन से उनको आज देखे "

चलो अब हुश्न का महताब देखें
अधूरे ही सही पर ख्वाब देखें

बड़ी कमसिन अदाएँ वो दिखाई
मेरा निखरा हुआ अन्दाज़ देखें

गये दिन बीत उस आवारगी के
मनाएँ जश्न इक आगाज़ देखें

अभी जिंदादिली है खूब उनमें
मुकद्दर जोड़कर एहसास देखें

बड़ी ही खूबसूरत सी गज़ल हैं
सजा लूँ लब पे फिर आवाज देखें

जरा सा हाँथ पकड़े चल पड़े बस
संवरते भाव के अल्फाज़ देखें

फ़तह फर्माइसों की कर लिए हैं
समूचेपन का ये विश्वास देखें

मुकर्रर जिन्दगी आखिर कहाँ है
भरे मन से उन्हें हम आज़ देखे

यहाँ अट्टालिका पे साथ हैं हम
हमारे प्यार को आकाश देखे

कई दिन, दोपहर हैं साल बीते
गये बचपन से उनको आज देखे 

03/01/2017

यह धरा पूरी तुम्हारी इस धरा को जीत लो

है यहाँ रहना तुम्हें तो गीत गाना सीख लो
ढाई आखर शब्द बोलो मुस्कुराना सीख लो

मैं नही कहता कि तुम परतंत्र हो निष्पन्द हो
किस कदर चलना तुम्हें जम्हूरियत से सीख लो

वो यहाँ जिस राह भेजें शान्त हो यूँ चल पड़ो
हाँथ में लेलो कटोरा और उनसे भीख लो

चल रहे हँथियार हों तो कष्ट तुम सहते रहो
जिन्दगी भर जख़्म खाओ दर्द हो जब चीख लो

चमड़ियाँ पहले भी उधड़ी आज भी आलम वही
थूँकने की चाह जब हो हाँथ में ही पीक लो

ख़त्म कर दे रूढ़ियाँ सब इस भरे संसार से
बुद्धि का कौशल दिखाओ साथ सारे मीत लो

और अब इंसानियत की है कहाँ कद्र-ए-हुज़ूर
बेड़ियाँ सब त्यागकर अब सर उठाना सीख लो

यह प्रकृति,यह भोग,वैभव शान्त यह वातावरण
यह धरा पूरी तुम्हारी इस धरा को जीत लो 

02/01/2017

राजसिंहासन पे अब मजदूर होने चाहिए

जिन्दगी के जख़्म सारे दूर होने चाहिए
जो इरादे नेक हों मंज़ूर होने चाहिए

राजधानी देश की रखे रहो दिल्ली मगर,
राजसिंहासन पे अब मजदूर होने चाहिए

कब तलक आखिर रखेंगें इस कदर इज्ज़ो -नियाज़
जुल्मियत की त्याग पे मज़कूर होने चाहिए

राष्ट्र यह उन्नति करे , हो राष्ट्र जन्नत की तरह
इस सियासत में सभी अब शूर होने चाहिए 

01/01/2017

गुब्बारे वाली बच्चियाँ

गुब्बारे वाली बच्चियाँ,
रोज़ दीखती हैं।
दिन - रात
विश्वविद्यालय के बाहर
लंका चौराहे पर ,
अपने भविष्य का निर्माण करती हुई ।

रोज़ दीखते हैं
उनके पवित्र हाँथों में गुब्बारे,
जो शायद अपना अस्तित्व स्थापित कर चुके हैं
उनके पवित्र हाँथों में ।
जिनमें अभी भी कई सम्भावनाएँ बची हुई हैं ।

रोज़ दीखते हैं बच्चे कचरा
बीनने वाले,
हर रोज़ हाँथ - फैलाते हुए बच्चे
दीख जाते हैं सड़कों पर
दीखते हैं होटल ,रेस्ट्राँ में
काम करते हुए बच्चे
उसी विश्वविद्यालय के बाहर जहाँ
लगभग 50 हजार
विद्यार्थियों का भविष्य रचा जा रहा है
रचे जा रहे हैं ,
डाक्टर ,मास्टर ,इंजीनियर
रचे जा रहे हैं ,
गायक ,वादक ,नर्तक
रचे जा रहे हैं कवि ,रचे जा रहे हैं
आलोचक,
रची जा रही हैं ढेरो सारी कलाएँ
संस्कृति और सभ्यताएँ
रची जा रही है पूरी की पूरी एक पीढ़ी भावी भविष्य की ।

उन हाँथों को अभी भी ,
पकड़ाया जा सकता है
काॅपी कलम और पुस्तकें ,
पकड़ाई जा सकती है एक राह
जो उनकी सुनहली मन्जिल तक जाए ।

बचे हुए हैं दिन ,महीने ,साल
बची है उनकी पूरी जिन्दगी
बचे होंगे सपने
जो वो हर रोज़ देखती होंगी ,
किसी बच्चे को बैग टाँगे देख
बचा होगा एक सुनहला भविष्य
जिसका निर्माण होना अभी बाकी है
अभी बाकी है रात की काली स्याह चादर का हटना ,
एक सुनहली सुबह के लिए ।

मालवीय जी ,
हर दिन - हर रात ,
रक्त होते होंगे लज्जा से
इन बच्चियों के हाँथों में गुब्बारे देखकर ।
शर्मिन्दगी से हर रोज़ अपना चेहरा
छुपाते होंगे ,
इन बच्चों के सामने ।।

नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ इन बच्चों के साथ आप सभी को ।।


जन्मदिन

जन्मदिन के इस सुअवसर पे तुम्हें अर्पण करूँ क्या देख लो मेरे हृदय को भावना दर्पण करूँ क्या पूँछता हूँ मैं अकिंचन आज अपने यार से बाँट दूँ...